भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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प्रत्यभिज्ञाहृदय [६१] समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या- मर्शान्नित्योदितसमाधिलाभः ॥१६॥ आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थाने अपि समाधिरससंस्कारेण, क्षीब इव सानन्दं घूर्णमानो, भावराशिं शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन एव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखताम् एव समवलम्बमानो, निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरे अपि समाध्येकरस एव भवति । यथोक्तं क्रमसूत्रेषु 'क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो भवति साधकः । तत्रादौ बाह्यात् अन्तः प्रवेशः, आभ्यन्तरात् बाह्यस्वरूपे प्रवेशः आवेशवशात् जायते;—इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः' इति । अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहृतिसंविच्चक्रात्मकं क्रमं मुद्रयति, सूत्र १६—समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बार-बार चित् (पारमार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत (सदा प्रकट) समाधि का लाभ होता है । भाष्य—श्रेष्ठ योगी जिसने समाधि प्राप्त कर लिया है, समाधि के आनन्द से संस्कार से मतवाले के समान आनन्द से झूमता हुआ, चिद्गगन में पदार्थों के समूह को शरदऋतु में बादल के टुकड़े के समान लीयमान देखता हुआ, बार-बार अन्तर्मुखता का अवलम्बन करता हुआ निमीलन १७० समाधि की प्रक्रिया द्वारा चित् (परमार्थ चेतना) से अपने ऐक्य का चिन्तन करता हुआ, जो व्युत्थान १७१ समझा जाता है उस अवसर पर भी, समाधिरस से अभिन्न ही रहता है । जैसा कि क्रमसूत्र में कहा है :— साधक अन्तःस्वरूप क्रम मुद्रा १७२ द्वारा बाहर की ओर देखते हुए भी समावेश की दशा में बना रहता है । इसमें (क्रम मुद्रा में) आवेश के प्रभाव से पहले चेतना का बाहर से भीतर की ओर प्रवेश होता है और फिर भीतर से बाहर की ओर प्रवेश होता है । इस प्रकार मुद्राक्रम बाह्य और आभ्यन्तर दोनों रूप का है । यहाँ पर (अर्थात् इस क्रमसूत्र का) यह अर्थ है :—क्रम = सृष्टि स्थिति और संहार रूपी चक्र अर्थात् फेरा (एक के बाद दूसरा निरन्तर होते रहना) । मुद्रा = मुद्रयति अर्थात् जो यह चित्शक्ति (पहले से ही) अपने भीतर स्थित

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