प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः, तया 'क्रममुद्रया' ; 'अन्तरिति'—पूर्णाऽहन्तास्वरूपया; 'बहिर्मुख'—इति, विषयेषु व्याप्रुतः अपि; 'समाविष्टः'—साक्षात्कृतपरशक्तिस्फारः 'साधकः'—परमयोगी भवति। तत्र च 'बाह्याद्' ग्रस्यमानात् विषयग्रामात् 'अन्तः' परस्यां चिति भूमौ, ग्रसनक्रमेणैव 'प्रवेशः'— समावेशो भवति। 'आभ्यन्तरात् चितिशक्तिस्वरूपात् च साक्षा- त्कृतात् 'आवेशवशात्'—समावेशसामर्थ्यात् एव 'बाह्यस्वरूपे'— इदन्तानिर्भासे विषयग्रामे, वमनयुक्त्या 'प्रवेशः'—चिद्रसाश्यानता- प्रथनात्मा समावेशो जायते;—इति 'सबाह्याभ्यान्तरः अयं' नित्योदित- ( सृष्टिस्थितिसंहार रूपी क्रम ) को आत्मसात् कर लेती है । (मुद्रा = मुद्रयति इति मुद्रा अर्थात् आत्मसात् करती है = अपना लेती है) । तया क्रममुद्रया = उस क्रम मुद्रा द्वारा । उस क्रममुद्रा द्वारा का पूरा अर्थ यह हुआ कि उस तुरीया चितिशक्ति के द्वारा जो अपने भीतर स्थिति सृष्टि- स्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित कर लेती है अर्थात् (स्पष्ट रूप से) आत्म- सात् कर लेती है । अन्तःस्वरूपया = भीतरी स्वरूप से अर्थात् पूर्ण अहन्ता- रूपी स्वरूप से । बहिर्मुख = विषयों में लगे हुए रहने पर भी । समाविष्टः = परमशक्ति के विकास को साक्षात् कर लेनेवाला । साधकः = परम् योगी । क्रममुद्रया--भवति साधक :-इस पूरे वाक्य का यह अर्थ हुआ “साधक अर्थात् परमयोगी बहिर्मुख होते हुए भी अर्थात् विषयों में लगे रहने पर भी समाविष्ट रहता है अर्थात् परमशक्ति के विकास का अनुभव करता रहता है।” किसके द्वारा ? अन्तःस्वरूप रूपी क्रममुद्रा के द्वारा अर्थात् जो पूर्णाहन्ता स्वरूपवाली तुरीया चितिशक्ति क्रम को अर्थात् सृष्टिस्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित कर लेती है अर्थात् आत्मसात् कर लेती है, उसके द्वारा । इसमें (क्रममुद्रा में) 'बाहर से' अर्थात् उन विषयपुंजों से जो ग्रहण किये जा रहे हैं 'भीतर' अर्थात् परम चितिभूमि में ग्रहण के द्वारा प्रवेश अर्थात् समावेश होता है । 'भीतर से' अर्थात् साक्षात् किये हुए चिति शक्तिस्वरूप से 'आवेशवश से' अर्थात् समावेश के प्रभाव से ही बाह्यस्वरूप में अर्थात् विषयपुंज में जो कि 'यह' के रूप में भासित होता है, वमनयुक्ति से अर्थात् बाहर की ओर प्रक्षेपण की प्रक्रिया से, 'प्रवेश' अर्थात् चित् रस का घनीभूततारूपी समावेश होता है । इस प्रकार यह मुद्राक्रम अथवा क्रममुद्रा 'सबाह्यान्तर' (बाह्य और आन्तरिक दोनों एक साथ) होता है । सबाह्यान्तर का तात्पर्य