प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 108, कुल 187 में से
संदर्भ में पढ़ें६८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
'सदा सर्वसर्गसंहारकारि' यत् 'सहजसंवित्तिदेवताचक्रम्'--अमायो- यान्तर्बहिष्करणमरीचिपुञ्जः, तत्र 'ईश्वरता'--साम्राज्यं परभैरवा- त्मता, तत्प्राप्तिः भवति परमयोगिनः । यथोक्तम् 'यदा त्वेकत्र संरूढस्तदा तस्य लयोद्भवौ । नियच्छन्भोक्तृतामेति ततश्चक्रेश्वरो भवेत् ॥' इति । अत्र एकत्र इति 'एकत्रारोपयेत्सर्वम्... ...।' इति । चित्सामान्यस्पन्दभूः उन्मेषात्मा व्याख्यातव्या । तस्य इति अनेन 'पुर्यष्टकेन संरुद्ध... ...।' इति उपक्रान्तं पुर्यष्टकम् एव पराम्रष्टव्यम्; न तु यथा विवरणकृतः 'एकत्र सूक्ष्मे स्थूले शरीरे वा' इति व्याकृतवन्तः । स्तुतं च मया
संहार करनेवाला जो स्वाभाविक ज्ञानरूपी देवता का समूह है अर्थात् जो कुछ भी अमायीय आन्तर और बाह्य इन्द्रियों का प्रभापुञ्ज है उस सब पर परम योगी को ईश्वरता अर्थात् साम्राज्य या परभैरवात्मता प्राप्त हो जाती है । जैसा कि कहा गया है । "जब कोई एक ही स्थान में (अर्थात् पूर्णाहन्ता के स्पन्दतत्त्व में) समाविष्ट हो जाता है, तब उसके (अर्थात् पुर्यष्टक के और निमीलन और उन्मीलन समावेश से उसके द्वारा विश्व का भी) लय (संहार) और उद्भव (सर्ग) को वश में करता हुआ (वास्तविक) भोक्तृता को प्राप्त होता है और चक्र (इंद्रिय देवताओं के समूह) का अधिपति हो जाता है।" (स्प० का० ३, १६) । यहाँ पर 'एकत्र' निम्नलिखित कारिका में समझाया गया है । "एकत्र (एक ही स्थान में) सब कुछ स्थापित करना चाहिए" (स्प० का० ३, १२) । इसमें 'एकत्र' की व्याख्या करनी चाहिए "चित् का सामान्यस्पन्द उन्मेष- स्वरूप" । 'तस्य' अर्थात् 'उसके' से 'पुर्यष्टक' ही समझना चाहिए क्योंकि इसके पूर्व में कहा गया है "पुर्यष्टकेन संरुद्ध" (स्प० का० ३, १७) (अर्थात् पुर्यष्टक से आबद्ध) । इसको वैसा नहीं समझना चाहिए जैसा कि विवरण- कार१८६ ने व्याख्या की है "एकत्र अर्थात् सूक्ष्म या स्थूल शरीर में।" जैसा कि मैंने एक स्तुति में कहा है :-