प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रत्यभिज्ञाहृदय ०६६ 'स्वतन्त्रश्चितिचक्राणां चक्रवर्ती महेश्वरः। संवित्तिदेवताचक्रजुष्टः कोऽपि जयत्यसौ ॥' इति। इतिशब्द उपसंहारे, यत् एतावत् उक्तप्रकरणशरीरं तत् सर्वं ‘शिवम्'--शिवप्राप्तिहेतुत्वात् शिवात् प्रसृतत्वात् शिवस्वरूपाभिन्नत्वात् च शिवममयमेव इति शिवम् ॥ देहप्राणसुखादिभिः प्रतिकलं संरुध्यमानो जनः पूर्णानन्दघनामिमां न चिनुते माहेश्वरीं स्वां चितिम् । मध्येबोधसुधाब्धि विश्वमभितस्तत्फेनपिण्डोपमं यः पश्येदुपदेशतस्तु कथितः साक्षात्स एकः शिवः ॥ येषां वृत्तः शांकरः शक्तिपातो येऽनभ्यासात्तीक्ष्णयुक्तिष्वयोग्याः। “जो अन्तः और बाह्य इन्द्रियों की अधिशासी संवित् शक्ति के समूह१८७ से सेवित होता हुआ चितिचक्र का स्वतन्त्र चक्रवर्ती सम्राट्१८८ और महेश्वर हो जाता है ऐसा बिरला व्यक्ति (वास्तविक) जय लाभ करता है।” सूत्र में जो ‘इतिशिवम्’ पद आया है उसमें ‘इति’ शब्द उपसंहार के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है—और शिव शब्द का भाव यह हैं कि इस छोटे ग्रन्थ (प्रकरण) का जो शरीर है (अर्थात् इस छोटे से ग्रंथ में जो कुछ कहा गया है) वह सब शिव हैं अर्थात् शिव की प्राप्ति का साधन है, और वह सब इसलिए भी शिव हैं क्योंकि वह शिव द्वारा विस्तृत रूप से कहा गया है, शिवस्वरूप से अभिन्न है और शिव ही है । “देह प्राण, सुख इत्यादि से प्रतिक्षण घिरा हुआ मनुष्य अपनी इस चिति को जो महेश्वर स्वरूप है, जो पूर्ण आनन्दघन है नहीं पहचानता । किन्तु जो इस उपदेश से ज्ञानरूपी अमृत समुद्र में विश्व को चारों ओर उसके फेनपिण्ड के समान देखता है वह साक्षात् शिव ही कहा जाता है। जिनमें शंकर का शक्तिपात हो गया है किन्तु जो अभ्यास न होने के कारण प्रखर तार्किक चिन्तन में असमर्थ हैं और इसलिए ईश्वर प्रत्यभिज्ञा