भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१०२ प्रत्यभिज्ञाहृदय प्रत्यभिज्ञा का तात्पर्य है' पूर्व में भात (ज्ञात) का वर्तमान में भास- मान (प्रतीत होता हुआ) के साथ एकीकरण, जैसे 'यह' (वर्तमान में भासमान) 'वही' (पूर्व में ज्ञात) चैत्र है। दूसरे शब्दों में पूर्व में अनुभूत वस्तु का अभिमुख (सामने) होने पर प्रतिसंधान अर्थात् अनुस्मरण के बल से ज्ञान होना प्रत्यभिज्ञा है। लोक में भी 'इसका पुत्र इस प्रकार के गुणवाला', 'इस प्रकार के रूपवाला' इसी प्रकार का ज्ञान है। अथवा सामान्य- रूप से ज्ञात वस्तु का फिर सामने होने के अवसर पर अनुस्मरण द्वारा ज्ञान ही प्रत्यभिज्ञा है ऐसा व्यवहार में पाया जाता है। 'राजा के प्रति इसका पहि- चान कराया गया' इत्यादि में भी 'प्रत्यभिज्ञा' का व्यवहार देखा जाता है। इस प्रसंग में भी प्रसिद्ध पुराण, सिद्धान्त, आगम, अनुमान इत्यादि के द्वारा पूर्ण शक्ति के स्वभाव वाले ईश्वर का ज्ञान प्राप्त होने पर, अपने आत्मा का स्फुटरूप से साक्षात्कार होने से प्रतिसन्धान (अनुस्मरण) के बल से दोनों ज्ञान के एकीकरण द्वारा जो यह ज्ञान उदय होता है कि निश्चित रूप से 'मैं वही ईश्वर हूँ' 'प्रत्यभिज्ञा' है। इस ग्रन्थ में क्षेमराज ने प्रत्यभिज्ञा- दर्शन का मर्म बतलाया है। इसीलिए उन्होंने इसका नाम रखा है 'प्रत्यभिज्ञाहृदयम्।' इस शास्त्र का यही संदेश है कि यदि कोई अपने सच्चे आत्मा को पहचान ले तो शरीर इत्यादि अनात्मा में जो आत्मबुद्धि है उससे वह छुटकारा पा जायगा और यह समझ लेगा कि उसका वास्तविक आत्मा विश्वात्मा शिव ही है। इस शास्त्र का दूसरा नाम है त्रिकदर्शन। 'त्रिक' का अर्थ है 'तीन का समूह'। वे तीन निम्नलिखित हैं :- (१) नर अर्थात् बद्ध जीव (२) शक्ति-शिव का तेज या पराक्रम, और (३) शिव जो नित्य पंचकृत्य करते रहते हैं। इसका तीसरा नाम स्पन्दशास्त्र है। स्पन्द का अर्थ हैं क्रियाशीलता। इसको स्पन्दशास्त्र इसलिए कहते हैं क्योंकि शिव या शक्ति की क्रियाशीलता के कारण ही जगत् का अस्तित्व है। २. शिव-इस शब्द की दो प्रकार से व्युत्पत्ति हो सकती है-(क) अदादिगण के 'शी' धातु से जिसका अर्थ होता है 'शयन करना'। जिसमें सब कुछ शयन करता है वह शिव है। (ख) दिवादिगण के 'शो' धातु से जिसका अर्थ होता है दुर्बल कर देना। जो सब दुःखों और पापों को दुर्बलकर देता है, वह शिव है। ये दोनों अर्थ 'शिव' शब्द में निहित हैं। शिव सब सृष्टि का अधिष्ठान है और वह परम कल्याणकारी भी है जो अपने अनुग्रह से सब