भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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टिप्पणियाँ १. प्रत्यभिज्ञा :—'प्रत्यभिज्ञा' शब्द का अर्थ है पहचान । किसकी पहचान ? अपने स्वरूप की। यह शास्त्र यह बतलाता है कि जीव शिव ही है। व्यष्टि और समष्टि का आत्मा एक ही है। संसार में आकर जीव अपने सच्चे स्वरूप को भूल जाता है और अपने स्थूल और सूक्ष्म देह ही को समझ बैठता है कि यह मैं हूँ । यह शास्त्र अपने सच्चे स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा ( पहचान ) करवाता है । इसलिए इसे प्रत्यभिज्ञादर्शन या प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र कहते हैं । अभिनवगुप्त ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी में 'प्रत्यभिज्ञा' की निम्नलिखित विशद व्याख्या प्रस्तुत की है। 'प्रतीपमात्माभिमुख्येन ज्ञानं प्रकाशः प्रत्यभिज्ञा । प्रतीपम् इति स्वात्माव- भासो हि न अननुभूतपूर्वोऽविच्छिन्नप्रकाशत्वात् तस्य, स तु तच्छक्त्यैव विच्छिन्न इव विकल्पित इव लक्ष्यते-इति वक्ष्यते । प्रत्यभिज्ञा च भातभासमान- रूपानुसंधानात्मिका, स एवायं चैत्र-इति प्रतिसंधानेन अभिमुखीभूते वस्तुनि ज्ञानम्; लोकेऽपि एतत्पुत्र एवंगुण एवं रूपक इत्येवं वा; अन्ततोऽपि सामान्यात्मना वा ज्ञातस्य पुनरभिमुखीभावावसरे प्रतिसंधितप्राणितमेव ज्ञानं प्रत्यभिज्ञा-इति व्यवह्रियते; नृपतिंप्रति प्रत्याभिज्ञापितोऽयम् - इत्यादौ । इहापि प्रसिद्धपुराणसिद्धान्तागमानुमानादिविदितपूर्णशक्तिस्वभावे ईश्वरे, सति स्वात्मन्यभिमुखीभूते तत्प्रतिसंधानेन ज्ञानम् उदेति, नूनं स एव ईश्वरोऽ हम्-इति ।' अर्थात् प्रत्यभिज्ञा' शब्द प्रति+अभि+ज्ञा से बना हुआ है। प्रति का अर्थ है 'प्रतीप' (प्रतिकूल, विपरीत); अभि का अर्थ है अभिमुख रूप से अर्थात् आमनेसामने, स्फुटरूप से, स्पष्टरूप से; ज्ञा का अर्थ है ज्ञान या प्रकाश ज्ञात होने पर भी विस्मृत तत्त्व का अभिमुख रूप से ज्ञान या प्रकाश' प्रत्यभिज्ञा है ।' 'प्रतीपम्' का भाव यह है कि अपने आत्मा का पूर्व में अवभास न हुआ हो ऐसा नहीं है, क्योंकि वह अविच्छिन्न रूप से प्रकाशित रहनेवाला तत्त्व है, किन्तु वह अपनी ही ( स्वातंत्र्य ) शक्ति से हटा हुआ जैसा, विभक्त हुआ जैसा जान पड़ता है - यह आगे बतलाया जायगा ।