प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहूँ। इदम् अर्थात् यह अखिल विश्व का निर्देश करता है। अहं अर्थात् मैं दिव्य प्रमाता सदाशिव का निर्देश करता है। यह सर्व व्यापी अहं (मैं) है। जब परं की अभिव्यक्ति प्रारम्भ होती है तो उसका सर्वप्रथम परामर्श होता है मैं यह हूँ (अहमिदम्) यह अर्थात् अखिल विश्व तो पहले से ही अव्यक्त रूप से परं (परमेश्वर) की चेतना में निहित रहता है। किन्तु जब परमेश्वर अपने को यह के रूप में प्रकट करता है, तो यही इस स्थूलरूप से व्यक्त होने वाले विश्व की प्रथम झांकी है। यह वह अवस्था है जिसमें यह (इदम्) रूप अस्फुट है और मैं (अहम्) रूप स्फुट है। इस अवस्था में विश्व अहन्ता (मैं) से आच्छादित है, और उसका इदन्ता (यह) रूप अस्फुट है, जिसमें विश्व सदाशिव से अभिन्न अर्थात् पर भी हैं और एक प्रकार से भिन्न अर्थात् अपर भी है। इसी से विश्व को परापर (पर+अपर) कहा है 'मैं यह हूँ' इस परामर्श में 'होना' (सत्) स्पष्ट है। यह सदाशिव का परामर्श है। इसलिए सदाशिवतत्व को सादाख्य (सत्-होना) भी कहते हैं। इस तत्व में इच्छा प्रधान है। इस दर्शन में प्रमाताओं का जो उच्चावचत्व (ऊँचा-नीचा स्तर) है उसे अब बतलाते हैं। जिसने सदाशिवतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वह प्रमाता मंत्रमहेश्वर कहलाता है। वह अखिल विश्व से तादात्म्य अनुभव करता है। ३५. ईश्वरतत्व—अभिव्यक्ति का यह दूसरा स्तर है। इसमें 'मैं' (अहन्ता) और 'यह' का परामर्श एक ही दर्जे का है अर्थात् दोनों का परामर्श समान रूप से स्फुट है। विश्व जो कि 'पर' (परमशिव) की चेतना में अव्यक्त रूप से निहित है, ईश्वर तत्व के स्तर पर यह (इदं) के रूप में सदा- शिवतत्व की अपेक्षा अधिक स्पष्ट रूप से व्यक्त हो जाता है। ईश्वरतत्व में ज्ञान प्रधान है। जिन्होंने ईश्वरतत्व का साक्षात्कार कर लिया है वे इस तत्व में अवस्थित होते हैं। वे मंत्रेश्वर कहलाते हैं। ईश्वर तत्व का परामर्श है 'इदम् अहम्' (यह मैं हूँ) इसमें यह अर्थात् विश्व अस्फुट रूप में नहीं रहता परन्तु उतना ही स्फुट हो जाता है जितना कि 'मैं'। इस अस्तर में 'मैं' और 'यह' की चेतना समान रूप से स्फुट रहती है। फिर भी 'यह' अथवा विश्व का 'मैं' से भिन्न बोध नहीं होता। सदाशिव और ईश्वर दोनों तत्वों में ग्राहक और ग्राह्य, मैं और यह में भेद नहीं है। केवल सदाशिव तत्व में अहं अथवा मैं अधिक फुस्ट है और इदं अथवा विश्व कम स्फुट है और ईश्वर तत्व में मैं और यह (विश्व) दोनों समानरूप से स्फुट हैं। इस स्तर के प्रमाता 'मन्त्रेश्वर' के अधिष्ठाता ईश्वर हैं। ३६. विद्या या शुद्धविद्यातत्व—यह वह तत्व है जिसमें अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों का ज्ञान भिन्न होता है। यहाँ से भेद प्रारम्भ होता है, किन्तु भेद के भीतर अभेद वर्तमान रहता है। इस तत्व में क्रिया प्रधान रहती है।