प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ टिप्पणियाँ ११३ इस तत्त्व के प्रमाता 'मंत्र' कहलाते हैं जो कि भेद देखते हैं, किन्तु अभेद में वह भेद भासित होता है। इन प्रमाताओं का अधिष्ठाता अनन्त भट्टारक है। इस तत्त्व के प्रमाता का परामर्श होता है 'इदं च अहं च', यह (विश्व) भी है और मैं भी हूँ, अर्थात् विश्व मुझसे भिन्न है, किन्तु सर्वथा भिन्न नहीं है। 'यह' या विश्व 'मैं' से अलग प्रतीत होते हुए भी 'यह' अथवा विश्व 'मैं' का ही एक प्रारूप है। 'यह' 'मैं' से सर्वथा भिन्न नहीं है। इसी से इस स्थिति का ज्ञान 'शुद्ध-विद्या' है। ३७ विज्ञानाकल--शुद्ध विद्या से नीचे और माया से ऊपर विज्ञानाकल की स्थिति है। विज्ञानाकल = विज्ञान + अकल-अर्थात् उसमें विज्ञान (बोध) है, किन्तु कर्तृत्व नहीं है। पूर्व अवस्था में परिचित सकल और प्रलयाकल ही उसके प्रमेयक्षेत्र हैं। विज्ञानाकल उनसे अपना अभेद अनुभव करता है। इसमें से मायीय और कार्ममल चले जाते हैं, केवल आणव मल रह जाता है। ३८. शून्यप्रमाता अथवा प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली-इसको स्पष्टरूप से न अहं (मैं) का बोध होता है, न इदं (जगत्) का। जिस प्रकार सुषुप्ति में शून्य जैसा भान होता है उसी प्रकार इसे शून्य का भान होता है जो कि प्रायः कुछ नहीं के समान है। प्रलयाकल वह प्रमाता है जो संहार और सृष्टि के बीच में प्रकृति से तादात्म्य रखता है। शून्यावस्था में पहुँचे हुए योगी भी प्रलयाकल प्रमाता ही हैं। प्रलयकाल में कला इत्यादि के विलीन हो जाने पर, नई सृष्टि के आरम्भ होने तक प्रलयाकल मायातत्त्व के भीतर विद्यमान रहता है। इसमें आणव और मायीय मल वर्तमान रहते हैं। कार्म मल चला जाता है। ३६. सकल--ये वे देव और जीव हैं जिन्हें सच्चा आत्मज्ञान नहीं होता और जिनकी चेतना मुख्यतः भेद की होती है। ये आणव, मायीय और कार्म तीनों मलों से आछन्न होते हैं। ४०--केवल प्रकाशरूप कहने का तात्पर्य यह है कि इस स्थिति में विमर्श अस्फुट है, प्रकाश ही स्फुट है। तीसरे सूत्र में प्रतिपादित विषय को हम एक सारणी में इस प्रकार रख सकते हैं :--