प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२४ प्रत्यभिज्ञाहृदय ६७. महार्थ—इस शास्त्र का महार्थ रहस्यात्मक प्रकार है। ६८. 'अहा ! कैसा अद्भुत है'। इस प्रकार का अनुभव विमर्शन या चमत्कार कहलाता है। कलात्मक अनुभूति में जो एकाएक विचित्र आनन्द होता है उसमें 'चमत्कार' का अनुभव होता है। ६६. पदार्थ के ज्ञान या प्रमेय को 'संहार' इसलिए कहा है, क्योंकि ज्ञान के समय पदार्थ बाह्यजगत् से संहृत होकर अर्थात् सिमट कर अपनी आन्तरिक चेतना की वस्तु बन जाता है। पदार्थ का पदार्थत्व या विषयत्व समाप्त होकर वह आन्तरिक चेतना का ज्ञान बन कर रह जाता है। १००. हठपाक—दो प्रकार से प्रमेय (अपने से भिन्न ज्ञेय विषय) प्रमातृ- स्वरूप से एकाकार बन जाता है। वे प्रकार है (१) शान्तिप्रशम (२) हठ- पाकप्रशम । 'प्रशम' का अर्थ है प्रमेय को प्रमातृभाव में लाकर एकाकार कर लेना। शान्तिप्रशम वह प्रकार है जिसमें शान्ति से धीरे धीरे क्रमशः प्रमेय को प्रमातृभाव में लाकर एकाकार किया जाता है। हठपाकप्रशम वह प्रकार है जिसके द्वारा उपदेश के बल से एकदम, एक बार ही, प्रमेय का चिदग्नि में पाक हो जाता है अर्थात् प्रमेय प्रमाता से एकाकार हो जाता है। सृष्टि आदि उपाधियाँ बिलकुल चिदग्नि में विगलित हो जाती हैं। १०१. अलग्रास—अलं का अर्थ है पूर्णरूप से, जिसमें संसार का कोई संस्कार भी न रह जाय। ग्रास का अर्थ है ग्रसन अर्थात् निगल जाना। अर्थात् प्रमेयों को स्वात्मसात् कर लेना, प्रमाता के साथ एकाकार कर लेना। १०२. 'मन्त्र'—दो अक्षरों से बना है—'मन'+'त्र'। 'मन्' का अर्थ है मनन करना और 'त्र' का अर्थ है त्राण। मनन करने से जो त्राण करे वह मंत्र है। मन्त्र उन अक्षर, शब्द वा शब्दों को कहते हैं जिनके उच्चारण और मनन से शक्ति जागृत होती हैं। इस सन्दर्भ में संसार से मोक्ष दिलाने की शक्ति अभिप्रेत हैं। १०३. दे० टि० ७४-७५। यह ध्यान में रखना चाहिए कि प्रत्यवमर्शात्मा चिति ही परावाक् है। वह परमात्मा का मुख्य स्वातन्त्र्य और ऐश्वर्य है। अमायीय अक्षरों से जनित आन्तरिक शब्द करती रहनेवाली चिति को नित्य उदित (सदा उच्चरित की गई हुई) परावाक् कहते हैं। पूर्ण होने के कारण इसको 'परा' और प्रत्यवमर्श द्वारा विश्व का अभिलाष करने के कारण इसको 'वाक्' कहा जाता है। 'पूर्णत्वात् परा', वक्ति विश्वमभिलपति प्रत्यवमर्शेन इति च 'वाक्' ई० प्र० वि० पृ० ५३। १०४. इसमें देवनागरी लिपि के सभी अक्षर समाविष्ट हैं। शैव दर्शन के अनुसार ये अक्षर भिन्न भिन्न शक्तियों के प्रतीक हैं।