प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियाँ १२५ १०५, दे० टि० ७४-७५ । १०६, दे० टि० ४८ । 'विकल्प क्रिया' विक्षेपशक्ति का संकेत करती हैं जिसके द्वारा भिन्न भिन्न पदार्थों का अवभास होता है । तदाच्छादितामेव- से आवरण शक्ति का संकेत है जो आत्मस्वरूप पर आवरण (परदा) डाल कर अविकल्प भूमि को छिपा देती है । इसी एक वाक्य में लेखक ने शक्ति के विक्षेप और आवरण दोनों रूपों का संकेत कर दिया है । १०७. 'अविकल्प निर्विशेष चेतना की भूमि है । यह भूमि 'यह' 'वह' इत्यादि विशेषों से परे विज्ञप्ति मात्र है । यह तुर्यातीत अवस्था है । १०८—'ककार इत्यादि अक्षरों की ब्राह्मी इत्यादि अधिष्ठात्री देवताएँ हैं । ये भिन्न भिन्न शक्तियाँ हैं जो ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डी और महालक्ष्मी नामों से अभिहित की जाती हैं । प्रत्येक वर्ग की अधिष्ठात्री देवी इस प्रकार है :-- अधिष्ठात्री देवी वर्ग १. ब्राह्मी कवर्ग २. माहेश्वरी चवर्ग ३. कौमारी टवर्ग ४. वैष्णवी तवर्ग ५. वाराही पवर्ग ६. इन्द्राणी यवर्ग ७. चामुण्डा शवर्ग ८. महालक्ष्मी अवर्ग १०६. भाव यह है कि जब तक जीव पशुदशा में रहता है तब तक शक्तियों का चक्र ( समुदाय ) भेद की सृष्टि और स्थिति (अर्थात् भेद की उत्पत्ति और उसकी स्थिति) अवभासित करती है और अभेद का संहार (मिटा देना, हटा देना) प्रकट करती है । इस दशा में जीव की प्रत्येक वस्तु एक दूसरे से भिन्न प्रतीत होती है और यह भिन्नता का भाव बना ही रहता है और अभेद की चेतना विलुप्त रहती है । पति दशा में जब जीव बन्ध से मुक्त हो जाता है, तब पशुदशा के विपरीत अवस्था होती है, तब वे ही शक्तियाँ अभेद की सृष्टि और स्थिति करती हैं और भेद का संहार करती है । पतिदशा दो प्रकार की होती है—(१) अनादिसिद्ध- दशा जो शाश्वत है जैसे शिव में (२) योगिदशा—वह जो योगियों को अनुभूत होती है । यहाँ पर दूसरे प्रकार की ही पतिदशा का वर्जन है । यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि पशुदशा में-भेद की सृष्टि और स्थिति