भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१२६ प्रत्यभिज्ञाहृदय और अभेद का संहार करने में शक्तियों का चक्र काम करता है किन्तु पतिदशा में अभेद की सृष्टि और स्थिति करने में और भेद का संहार करने में—इनका चक्र विगलित हो जाता है और स्वयं शक्तियाँ काम करने लग जाती हैं । ११०. भैरव मुद्रा—इसका लक्षण शास्त्रों में इस प्रकार दिया हुआ है— अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिनिमेषोन्मेष-वर्जितः । इयं सा भैरवी मुद्रा सर्वतन्त्रेषु गोपिता ॥ दृष्टि निमेष (पलकों का बन्द करना) और उन्मेष (पलकों का खोलना) दोनों से वर्जित होकर बाहर की ओर लगी हो और चेतना बाहर की ओर न जाकर भीतर में स्थित आत्मा को अपना लक्ष्य बनाये रहे अर्थात् इन्द्रिय तो बाहर की ओर खुला हो, किन्तु चित्त भीतर की ओर पलटा हुआ हो—यह अवस्था भैरवी मुद्रा की है जो कि सब तंत्रों में गुप्त रखी जाती है । १११. शुद्धविकल्प शक्ति—यह वह विकल्प (विशेष प्रकार की कल्पना) है जिसमें साधक 'शिवोऽहं'—'मैं शिव हूँ' के भाव का अनुभव करता है । यह भी विकल्प है, किन्तु शुद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें साधक अन्य विकल्पों को छोड़ कर परमात्मा से अपने तादात्म्य के भाव को बनाये रखता है । यह परमात्मा से ऐक्य की चेतना है । इस शुद्ध विकल्प के अभ्यास से साधक निर्विकल्प अवस्था में पहुँच जाता है । शुद्ध विकल्प द्वारा साधक को यह अनुभव होने लगता है कि सारा विश्व मेरा ही (अर्थात् आत्मा का ही) वैभव है । ११२. विकल्प—दे० टि० ४६ ११३. 'महेशता' अथवा माहेश्वर्य वह अवस्था है जिसमें जीवात्मा महेश अथवा परमात्मा के साथ तादात्म्य का अनुभव करता है । ११४. यहाँ पर ग्रन्थकर्ता ने यह बतलाया है कि इस शक्ति का वामेश्वरी क्यों नाम पड़ा । 'वाम' शब्द 'वम्' धातु से सम्बद्ध है जिसका अर्थ होता है वमन करना, बाहर फेंकना । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए कहलाती है क्योंकि यह विश्व को परम शिव से वाहर फेंकती है । 'वाम' शब्द का अर्थ बायाँ और विपरीत भी है । यह शक्ति वामेश्वरी इसलिए भी कहलाती है, क्योंकि शिव में अभेद, पूर्णता की चेतना है किन्तु संसारदशा में उसके विपरीत भेद और अपूर्णता की चेतना है और प्रत्येक जीव-शरीर, प्राण इत्यादि को ही 'मैं' समझने लगता है । वामेश्वरी के 'वाम' में यह श्लेष वर्तमान है जो अनुवाद में नहीं व्यक्त किया जा सकता । ११५. खेचरी, गोचरी, दिक्चरी और भूचरी, वामेश्वरी शक्ति के ही भिन्न भिन्न प्रकार हैं । खेचरी का सम्बन्ध प्रमाता से है, गोचरी का