प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियां १२७ सम्बन्ध अन्तःकरण से है, दिक्चरी का सम्बन्ध बहिष्करण (बाह्य इंद्रियों) से है, भूचरी का सम्बन्ध भावों (पदार्थों) से है। ये शक्तिचक्र अपरि- च्छिन्न सत्ता को परिच्छिन्न (परिसिमित) बनाते हैं। खेचरी चक्र के द्वारा चेतन (आत्मा) अपरिमित प्रमाता से परिमित प्रमाता बन जाता है। गोचरी चक्र से वह अन्तःकरण से परिच्छिन्न हो जाता है। दिक्चरी चक्र के द्वारा वहबहिष्करणों से परिच्छिन्न हो जाता है। भूचरी चक्र के द्वारा वह भावों (पदार्थों) में ही अटका रह जाता हैं। खेचरी--खे (आकाशे) चरतीति खेचरी। 'ख' शब्द का अर्थ आकाश है। 'खे' सप्तमी विभक्ति है। इसका अर्थ है 'आकाश में'। यहाँ पर 'ख' या आकाश चित् का प्रतीक है। इस शक्ति का नाम खेचरी इसलिए पड़ा है क्योंकि इसका क्षेत्र चिद्गगन है। चिद्गगन के पारमार्थिक स्वभाव की छिपाकर यह प्रमाता को परिमित बना देती है। वह अब पशु बन जाता है। गोचरी उसे कहते हैं जिसका क्षेत्र अन्तःकरण होता है। संस्कृत का 'गो' शब्द गमन वा चलन का द्योतक है। किरण, गो, इन्द्रिय यह सब 'गो' कह- लाता है क्योंकि इन सब में गमन का भाव निहित है। अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, वही इन्द्रियों को परिचालित करता है। इसलिए वह गोचरी शक्तिचक्र का क्षेत्र है। दिक्चरी वह शक्ति है जो दिक् (दिशाओं) में चलती रहती है। बहिष्करण वा बाह्य इन्द्रियों का सम्बन्ध दिक् का देश से हैं। इसलिए दिक्चरी शक्तिचक्र का क्षेत्र बाह्य इन्द्रियाँ हैं। भूचरी में जो 'भू' शब्द है उसका अर्थ है 'होना'। जो कुछ हो गया है वह 'भू' के अन्तर्गत है। अतः यह भाव अर्थात् पदार्थ वा प्रमेयों (विषयों) का द्योतक हैं। सभी पदार्थ वा प्रमेय भूचरी के क्षेत्र हैं। परिमितप्रमाता - उसका अन्तःकरण उसका बहिष्करण और उसके प्रमेय सभी भिन्न शक्तिचक्रों की अभिव्यक्ति हैं। ११६. अन्तःकरण के तीन प्ररूप हैं—बुद्धि, अहंकार और मन। बुद्धि का काम निश्चय करना है, अहंकार का काम अभिमान है जिसके द्वारा जीव शरीर इत्यादि अनात्म पदार्थों से तादात्म्य स्थापित करता है और भोक्ता बनता है और मन का कार्य है पदार्थों का 'यह घट है,' 'यह पट है' इत्यादि प्रकार से, भेद-विकल्प करना। ११७. ऐश्वर्य शक्ति परमेश्वर अर्थात् परमशिव के प्रभुत्व अथवा आधि- पत्य की शक्ति है। यह उसके स्वातंत्र्य शक्ति का ही दूसरा नाम है।