भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 187 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 138

१२८ प्रत्यभिज्ञाहृदय स्वातन्त्र्य शक्ति का यह भाव है कि परमशिव सब कुछ करने, न करने अथवा अन्य प्रकार से करने में पूर्णतः स्वतंत्र है। उसके अतिरिक्त कोई दूसरी ऐसी शक्ति नहीं जिसके दबाव से वह ऐसा करता हो । ११८-११६. स्फुरत्ता प्रकाश का ही दूसरा नाम है और कर्तृता विमर्श का दूसरा नाम है। प्रकाश और विमर्श को समझने के लिए देखिए टि० २१ । १२०. प्राण, अपान, समान शक्ति-पंचप्राण प्रसिद्ध हैं। वे हैं प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान । ये अधिकतर पाँच वायु के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। इन्हीं पांच प्राणों से जीवों का जीवन चलता रहता है। प्राण शरीर से भिन्न होते हैं। वे शरीर के सारे कार्य चलाते रहते हैं। प्राणों की अभिव्यक्ति वायु के द्वारा होती है। प्राण सामान्य अर्थ में जीवन के कार्य चलाने वाली सभी शक्तियों के लिए प्रयुक्त होता है। विशेष अर्थ में प्राण वह वायु है जो नथने से बाहर निकलता है जिसे प्रश्वास कहते हैं। अपान वह वायु है जो नीचे गुदा की ओर जाता है और जो मल-मूत्र को बाहर फेंकता है। समान वह वायु है जो शरीर के भीतर कार्य करता हुआ अन्न इत्यादि के पचाने के अनन्तर उनका शरीर में समीकरण करता है। उदान वह वायु है जो ऊपर की ओर जाता है। यहाँ पर प्राण, अपान, समान इत्यादि शक्ति कहे गये हैं। इन्हीं नाम के वायु इन्हीं शक्तियों के कार्य हैं जैसे प्राण वायु प्राणशक्ति का कार्य है इत्यादि । प्राण, अपान, समान शक्तियों से जीव बद्ध होता है, वह पशु बनता है और उदान और व्यान शक्तियों से वह मुक्त हो जाता है, पति बनता है। १२१. पुर्यष्टक-यह सूक्ष्मशरीर का पर्याय है जो कि संस्कारो का कोश है, जो स्थूल शरीर की भांति मृत्यु के समय नष्ट नहीं हो जाता । पुर्यष्टक = पुरी + अष्टक । पुरी का अर्थ है पुर (नगर) । अष्टक का अर्थ है अष्ट (आठ) का समुदाय । पुर्यष्टक का अर्थ हुआ 'आठ के समुदाय वाला पुर' । यह अष्टक या आठ का समुदाय निम्नलिखित है:- ५-तन्मात्राएँ + बुद्धि + मन + अहंकार । १२२ इस सन्दर्भ में कला का अर्थ है, भाग, अंग जो जीव को परिमित और बद्ध बनाते हैं। १२३-जब प्राण और अपान तुल्यबल हो जाते हैं, तब उदान शक्ति का आविर्भाव होता है। तब उदानशक्ति क्रियाशील हो जाती है और मध्यधाम वा सुषुम्ना के भीतर में ऊपर की ओर जाती है और तुर्य अर्थात् चेतना की चौथी अवस्था को प्रकट करती है।