भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 139

६ टिप्पणियाँ १२६ १२४. 'मध्यधाम' मध्यवाली नाड़ी है जिसे सुषुम्ना कहते हैं । सुषुम्ना की दोनों ओर नाड़ियाँ हैं जो भौतिक नाड़ियाँ नहीं हैं, किन्तु प्राण की नाड़ियाँ हैं । जिसमें से कुछ प्रवाह होता है वह नाड़ी कहलाता है । सुषुम्ना की दोनों ओर जो नाड़ियाँ हैं वे ईडा और पिंगला कहलाती हैं । ईडा नाड़ी में प्राण का प्रवाह होता है और पिंगला में अपान का । ईडा सुषुम्ना की बाईं ओर है और पिंगला दाहिनी ओर । ईडा को सूर्यनाडी और पिंगला को चन्द्रनाडी भी कहते हैं । सुषुम्ना वह नाड़ी है जो मेरुदण्ड के भीतर से होकर ऊपर मस्तिष्क की ओर जाती है । मनुष्य में सामान्यतः प्राण और अपान शक्तियाँ ही क्रियाशील रहती हैं। जब योग के अभ्यास से प्राण और अपान की धाराएं तुल्यबल हो जाती हैं, तब मध्यधाम अर्थात् सुषुम्ना का मार्ग खुल जाता है और उदान की धारा उसके भीतर से सहस्रार की ओर बहने लगती हैं और तब चेतना की तुर्यअवस्था घटित होती हैं । १२५. तुर्य--तुर्य शब्द का अर्थ है चौथा । चतुर् शब्द का अर्थ होता है चार । तुर्य शब्द 'चतुर् + यत्' से बना है 'चतुर्' के 'च' का लोप हो जाता है, केवल 'तुर्' रह जाता है और यत् प्रत्यय के त् का लोप हो जाता है, केवल 'य' रह जाता है । 'तुर् + य' से 'तुर्य' हो जाता है जिसका अर्थ होता है चौथा । सामान्यतः मनुष्य की चेतना तीन अवस्थाओं में कार्य करती रहती है- जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति ( गाढ़ निद्रा ) । जब मध्य धाम अथवा सुषुम्ना में उदान शक्ति क्रियाशील होती है, तो तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था की चेतना की उपलब्धि होती है । इस अवस्था में अभेद बुद्धि होती है, भेदबुद्धि चली जाती है । यह अवस्था आनन्दपूर्ण होती है । प्रथम अर्थात् जाग्रत् अवस्था में, देह, प्राण मन और इन्द्रियां क्रियाशील रहती हैं । द्वितीय अर्थात् स्वप्न की अवस्था में केवल प्राण और मन क्रियाशील रहते हैं। तृतीय अर्थात् सुषुप्ति अवस्था में मन भी निष्क्रिय हो जाता है और आत्मा अर्थात् शुद्ध चैतन्य को केवल शून्य का बोध रह जाता है । तुर्य अर्थात् चौथी अवस्था में जीव उपर्युक्त अवस्थाओं से छुटकारा पा जाता है और चिदानन्दघन अवस्था में रहता है । हमारी जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ परस्पर पृथक् होती हैं अर्थात् जाग्रत् अवस्था में स्वप्न और सुषुप्ति की अवस्था नहीं रहती । स्वप्नावस्था में जाग्रत् और सुषुप्ति की चेतना नहीं रहती, सुषुप्ति अवस्था में जाग्रत् और स्वप्न की चेतना नहीं रहती । जब हम एक अवस्था में रहते हैं, तो हमें अन्य दो अवस्थाओं का बोध नहीं रहता । प्रत्येक अवस्था का बोध पृथक्