भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 140, कुल 187 में से

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पृष्ठ 140

१३० प्रत्यभिज्ञाहृदय पृथक् होता है। इन तीनों अवस्थाओं में हमारी चेतना खण्डशः कार्य करती है। किन्तु जब हमें तुर्यावस्था की उपलब्धि होती है, तो हमें बराबर तीनों अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अखण्ड सम्पूर्ण चेतना है, उसे सदा तीनों अवस्थाओं का बोध रहता है। तुर्य अविच्छिन्न चेतना है। जब तुर्य चेतना दृढ़रूप से प्रतिष्ठित हो जाती है, तो मन की खण्डवृत्ति अर्थात् मन का खण्डशः विभागशः जानने का स्वभाव क्षीण हो जाता है। तुर्य चेतना एक ऐसी अवस्था है जिसके द्वारा हमें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का सदा बोध रहता है। माया के कारण हममें भेदबुद्धि रहती है। तुर्य अर्थात् चौथा एक सापेक्ष शब्द है। यह जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य वा तुरीय (चौथा) कहा जाता है। जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ विलुप्त नहीं हो जातीं। केवल यह होता है कि तुर्य-अवस्था को उपर्युक्त तीनों अवस्थाओं का सदा बोध रहता है। वह उपर्युक्त तीन अवस्थाओं से छिन्न नहीं रहती। तुर्य अवस्था उदानशक्ति के द्वारा सम्पन्न होती है। १२६. व्यानशक्ति—समष्टि की दृष्टि से यह विश्व भर में व्याप्त है; व्यष्टि की दृष्टि से कुण्डलिनी के जाग्रत् होने पर यह सारे शरीर में व्याप्त हो जाती है और इसके द्वारा तुर्यातीत अवस्था सम्पन्न होती है। १२७—तुर्यातीत दशा:—इसका अर्थ है 'तुर्य अर्थात् चौथे से अतीत'। यह तुर्य से परे की अवस्था है। तुर्य (चौथा) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति— इन तीन अवस्थाओं की अपेक्षा से तुर्य कहलाता है। तुर्यातीत दशा में उपर्युक्त तीन अवस्थाओं का विलोप हो जाता है। इसलिए जब तीन अव- स्थाओं का विलोप हो जाता है, तब तुर्य जो उन तीनों की अपेक्षा से तुर्य कहलाता था फिर तुर्य नहीं कहा जा सकता। तब वह अवस्था तुर्यातीत कहलाती है अर्थात् वह अवस्था जिसमें तुर्य अतीत हो गया है, चला गया है, समाप्त हो गया है। तुर्यातीत दशा में चेतना निस्तरङ्ग महोदधि के समान हो जाती है और आनन्द से परिपूर्ण होती है। यह शिव-चेतना है। यह वह अवस्था है जिसमें समस्त विश्व का अपने आत्मा जैसे भान होता है। तुर्य दशा में मन केवल क्षीण हो जाता है, तुर्यातीय दशा में वह शक्ति में विलीन हो जाता है। जब तुर्य अवस्था पूर्णरूप से विकसित होकर अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है, तब वह तुर्यातीत में परिणत हो जाती है। इस अवस्था में व्यक्ति को सब कुछ शिव या आत्मा जैसा प्रतीत होता है। १२८. पतिदशा—यह वह दशा है जिसमें जीव का पति अर्थात् शिव से तादात्म्य हो जाता है।

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