प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियाँ १३१ १२६. ६ वें विद्वत् सूत्र में संसारित्व का वर्णन परमशिव के दृष्टिकोण से किया गया है। उसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार परमशिव अपने स्वातन्त्र्य से अपनी इच्छा ज्ञान-क्रिया शक्तियों का संकोच करके संसारित्व सम्पादित करता है। इस १२वें सूत्र में संसारित्व का वर्णन जीव के दृष्टिकोण से किया गया है। इसमें यह बतलाया गया है कि किस प्रकार जीव पशुदशा में अपने ही शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर संसारित्व को प्राप्त होता है और किस प्रकार पतिदशा में उदानशक्ति से तुर्यावस्था और व्यानशक्ति से तुर्यातीत अवस्था में पहुँच जाता है। जीव पशुदशा में शक्तिचक्रों से व्यामोहित होकर संसारी बनता है, पतिदशा में शक्ति के विकास से जीवन्मुक्ति लाभ करता है। १३०. यहाँ यह नहीं बतलाया गया हे कि ग्रन्थकार प्रत्यभिज्ञा की किस टीका का संकेत कर रहा है। सम्भवतः उत्पलाचार्य ने ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका पर जो विवृति लिखी थी और जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुई है उसी का संकेत ग्रन्थकार ने किया है। १३१. चित्त--जीव की संकुचित संवित् । १३२. चेतन-इस शब्द का इस प्रसंग में अर्थ है आत्मा की तात्विक संवित् । १३३. चिति-संवित् का असंकुचित वास्तविक स्वरूप। इसे चित् भी कहते हैं। चित् की शक्ति को प्रायः 'चिति' कहते हैं। १३४. उत्पलदेव या उत्पलाचार्य का काल ६००-६५० ईसवी शती है। यह उद्धरण शिवस्तोत्रावली से किया गया है। १३५. परम्परागत त्रिमूर्ति है-ब्रह्मा, विष्णु, शिव। इस शास्त्र में शिव चरम सत् के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसलिए इसमें शिव के स्थान में इन्द्र शब्द का प्रयोग हुआ है। १३६. यह उद्धरण वसुगुप्त की स्पन्दकारिका का है। पूरी कारिका इस प्रकार है :- तदाक्रम्यबलं मन्त्राः सर्वज्ञबलशालिनः । प्रवर्त्तन्तेऽधिकाराय करणानीव देहिनाम् ॥ (स्प० २ का १०) अर्थात् मन्त्र (चिति) के उस बल को प्राप्त कर सर्वज्ञ (शिव) के बल से सम्पन्न हो जाते हैं और तब अपने अधिकृत कार्य में प्रवृत्त होते हैं जैसे देही (व्यक्ति) की इन्द्रियाँ (देही की शक्ति से अपने अधिकृत कार्य में प्रवृत्त होती हैं, केवल अपने से ही नहीं)। १३७. समावेश समाधि की वह अवस्था है, जिसमें एकत्व का बोध होता है, जिसमें समस्त विश्व का आत्मवत् बोध होता है, जिसमें जीव की चेतना शिव की चेतना से तादात्म्य लाभ करती है।