भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१३२ प्रत्यभिज्ञाहृदय १३८. व्युत्थानदशा-व्युत्थान का शाब्दिक अर्थ है 'उठना'। व्युत्थानदशा का अर्थ है समाधिदशा से चित्त का साधारण दैनिक जीवन की दशामें आ जाना । १३६. देहप्राणनीलसुखादिषु-'देहप्राण' प्रमाता का सूचक है। इसमें सापेक्ष बुद्धि से देह बाह्य है और प्राण आन्तर, 'नीलसुखादि' प्रमेय का सूचक है। इसमें 'नील' बाह्यप्रमेय ओर 'सुख' आन्तर प्रमेय का सूचक है। १४०. मध्य-मध्यनाड़ी; 'मध्य' शाम्भव दृष्टि से सर्वव्यापी चित् है जो कि सबके भीतर की मध्यभूत सत्ता है। वह शिव की विशुद्ध अहंता (अहं-चेतना) है। 'शक्ति' की दृष्टि से वह ज्ञान-क्रिया है। 'अणु' (जीव) की दृष्टि से वह मध्य नाड़ी है। मध्यनाड़ी अथवा मध्यमानाड़ी सुषुम्ना नाड़ी है जो ईडा और पिंगला के बीच की नाड़ी है। 'नाडी' शब्द नड धातु से व्युत्पन्न हुआ है जिसका अर्थ गिरना या बहना है। जिसमें से कुछ गिरे या बहे वह नाडी है। नाडी वह नली है जिसमें से प्राण का प्रवाह होता रहता है। सुषुम्ना नाडी का मध्य वा मध्यमानाडी नाम इसलिए है क्योंकि वह शरीर के मध्य में है। 'सुषुम्ना' शब्द की व्युत्पत्ति सन्दिग्ध है। शब्दकल्पद्रुम के अनुसार इसकी व्युत्पत्ति है 'सुषु इत्यव्यक्तशब्दं मनति' (सुषु+√म्ना) अर्थात् जो 'सुषु' यह अव्यक्त ध्वनि करती रहती है, वह सुषुम्ना है। कुछ लोगों ने नाडी को 'नर्व' (वायुनाडी) और चक्रों को 'गैंग्लिया' (नाडी ग्रन्थि) समझ रखा है। यह भ्रम है। योग की नाडी और चक्र स्थूल शरीर के अङ्ग नहीं हैं। वे सूक्ष्म शरीर में प्राणमयकोश के अंग हैं। केवल उनका संस्पर्श और प्रभाव स्थूल शरीर के 'नर्व' (नाडी) और 'गैंग्लिया' (नाडीग्रन्थियों) के द्वारा व्यक्त होता है। चक्र प्राणशक्ति के अधिष्ठान हैं। १४१. प्राणशक्ति का इस सन्दर्भ में तात्पर्य सर्वव्यापी आद्या प्राणशक्ति से है, न कि व्यक्ति के भीतर जो प्राणवायु है। चिति का आत्मस्वरूप को गोपन करने के लिये और धीरे धीरे पञ्चमहाभूत में परिणत हो जाने में यह पहला क्रम है। इस प्राणशक्ति को महाप्राण भी कहते हैं। १४२ ब्रह्मरन्ध्र-तंत्रशास्त्र के अनुसार प्राणमय कोश में कई चक्र अवस्थित हैं जो कि प्राण के भिन्न भिन्न केन्द्र हैं। ये चक्र इसलिए कहलाते हैं क्योंकि इनकी आकृति चक्र (चाक) जैसी प्रतीत होती है। इनके भीतर प्राण पुञ्जीभूत रहता है और प्राणमयकोश के माध्यम से उस प्राण का वितरण सारे स्थूल शरीर को होता है।