प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियां १३३ जब ऊपर के चक्र जाग्रत् हो जाते हैं तब साधक को कुछ सूक्ष्म और गुह्य अनुभव होते हैं । उनके नाम स्थूल शरीर के सबसे निकट के अवयवों के साथ नीचे दिये हैं । संस्था | सबसे निकट का स्थूलशरीर का अवयव | चक्र १. जननेन्द्रिय के नीचे मेरु दण्ड का प्रदेश मूलाधार २. जननेन्द्रिय के ऊपर ,, ,, स्वाधिष्ठान ३. नाभि का ,, ,, मणिपूर ४. हृदय का ,, ,, अनाहत ५. कण्ठ के नीचे का ,, ,, विशुद्ध ६. भ्रूमध्य का ,, ,, आज्ञा ७. सिर का ऊपरी भाग ,, ,, सहस्रार अथवा ब्रह्मरन्ध्र । १४३. अधोवक्त्र–इसका शब्दार्थ है नीचे का अवयव । इसको मेढ्रकन्द भी कहते हैं । यह गुदा के मूल में है । १४४. पलाशपत्र–ढाक के पत्ते को पलाशपत्र कहते हैं । पलाशपत्र की मध्य शाखा का तात्पर्य है 'मध्यतन्तु' । सुषुम्ना की पलाशपत्र के मध्यतन्तु से उपमा दी गई है । जो नाड़ियाँ सुषुम्ना से शरीर में चारों ओर जाती हैं, उनकी उपमा पलाशपत्र के मध्यतन्तु में जुड़ी हुई अन्य तन्तुओं से दी गई हैं जो कि उस पत्र के चारों ओर फैली हुई हैं । १४५. मध्यम नाड़ी—सुषुम्ना है जो कि मेरुदण्ड के भीतर से होती हुई मस्तिष्क तक जाती है । यह मूलाधार से सहस्रार तक प्रसृत है । सुषुम्ना आग के समान चमकती हुई तामसिक नाडी है । इसके भीतर दीप्तिमती वज्रा या वज्रिणी नाडी है जो राजसिक है । इस वज्रिणी नाडी के भीतर पीतवर्ण की चित्रा या चित्रिणी नाडी है जो सात्त्विक है । इसी चित्रिणी नाडी के भीतरी भाग को ब्रह्मनाडी कहते हैं । तंत्रों ने सुषुम्ना को 'वह्नि- स्वरूपा' ( आग के समान ) वज्रिणी को सूर्यस्वरूपा ( सूर्य के समान ) चित्रिणी को चन्द्रस्वरूपा ( चन्द्र के समान ) बतलाया है । चित्रिणी नाडी जहाँ समाप्त होती है वहाँ जो छिद्र है वह ब्रह्मद्वार कहलाता है । इसी द्वार के भीतर से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर को जाती है । ईडा और पिंगला नाडियाँ सुषुम्ना के बाहर हैं जो कि समानान्तर रूप में उसके ऊपर से जाती है । बाईं ओर ईडा है और दाहिनी ओर पिंगला ।