भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 144

१३४ प्रत्यभिज्ञाहृदय ये नाडियाँ धनुषाकारवत् टेढ़ी हैं। ये नासारन्ध्र पर्यन्त तक गई हैं। मेरु- दण्ड के मध्य में सुषुम्ना है। उसके बाहर बाईं ओर ईडा है और दाहिनी ओर पिंगला इन तीनों का आज्ञा चक्र के पास संयोग होता है जो कि त्रिवेणी कहलाता है। १४६. यह विकास शाम्भवोपाय और शाक्तोपाय की दृष्टि से होता है। १४७. ब्रह्मनाडी—यह मध्यनाडी या सुषुम्ना का ही दूसरा नाम है। १४८. यदामध्यभूता ब्रह्मनाडी विकसति—यह विकास आणवोपाय की दृष्टि से होता हैं। १४६. प्राणायाम का अर्थ है प्राण का आयाम। आयाम का भाव है नियमन अर्थात् नियमित करने की क्रिया। प्राण-अपान, श्वास-प्रश्वास को एक विशेष नियम से लेने और छोड़ने की क्रिया को प्राणायाम कहते हैं। १५०. मुद्रा—इसका साधारण अर्थ है 'छाप, मोहर'। योग में इसका अर्थ होता है विशेष अंग-विन्यास, (विशेष रूप से हाथ और अँगुलियों की निश्चित स्थिति)। अधिक व्यापक रूप में इसका अर्थ होता है कुछ अवयवों और इंद्रियों का विशेष-नियंत्रण जिससे ध्यान और समाधि में सहायता मिलती है, जैसे भैरवी मुद्रा। देखिए घेरण्डसंहिता-तृतीयोपदेश। १५१. बन्ध—इसका शाब्दिक अर्थ है 'बाँधना'। इस सन्दर्भ में इसका अर्थ है योग की वह क्रिया जिसमें किसी विशेष अवयव या अंग को आकुंचित करके रोके रखते हैं। १५२. हृदय—इसका अर्थ यहाँ पर वह हृदय या मासपिण्ड नहीं है जिसके द्वारा सारे शरीर में रक्त प्रसारित होता है। यहाँ पर हृदय का भाव है 'अन्तस्तम चेतना'। इसको हृदय इसलिए कहा है क्योंकि यह समस्त सत्ता का केन्द्र है। यह वह प्रकाश है जिसमें सारा विश्व निहित है। व्यक्ति में यह आध्यात्मिक केन्द्र है। १५३. विकल्प—दे० टि० ४६। १५४. तुर्य—दे० टि० १२५। १५५. तुर्यातीत—दे० टि० १२७। १५६. यहाँ पर क्षेमराज ने भूल की है। कठोपनिषद्—अथर्ववेद की नहीं है, यजुर्वेद की है। अश्नन् के स्थान पर प्रायः इच्छन् पाठ मिलता है। १५७ स्वसंवित्ति अथवा आत्मचेतना की दो स्थिति होती है -(१) शान्तोदित (२) नित्योदित। (१) शान्तोदित वह स्थिति है जिसमें आत्म- चेतना का आविर्भाव होता है, किन्तु फिर तिरोभाव हो जाता है। (२)