प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंटिप्पणियां १३५ नित्योदित में आत्मचेतना का सदा आविर्भाव बना रहता है, कभी तिरो- भाव नहीं होता । आत्मा तो नित्योदित है ही, उसमें हमारी चेतना की स्थिति बराबर नहीं रहती । शक्तिसंकोच के सिद्ध होने पर हमारी चेतना की नित्योदित में स्थिति हो जाती है । १५८. ऊर्ध्वकुण्डलिनी—जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं और कुण्डलिनी ऊपर को उठती है तो उसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहते हैं । कुण्ड- लिनी एक विशेष शक्ति है जो मूलाधार में ३½ वलयों (लपेटों) में प्रसुप्तरूप से वर्तमान है । जब वह मंत्र अथवा ध्यान के द्वारा जाग्रत् होती है, १ ३/४ वलयों से सुषुम्नानाड़ी के भीतर से ऊपर की ओर उठती है, लम्बिका को पारकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है, तो वह ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहलाती है और उसकी इस व्याप्ति को विकास या विष कहते हैं । जिह्वामूल के पास चार प्राण नाड़ियों के चतुष्पथ ( चौराहा ) को लम्बिका कहते हैं । दो नाड़ियां वे हैं जिनके द्वारा सभी जीवों में प्राण का प्रवाह होता है । तीसरी नाडी वह है जिसके द्वारा योगी मूलाधार से ऊर्ध्वकुण्डलिनी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है। चौथी नाडी उन सिद्ध योगियों के लिए हैं जिनका प्राण-वायु बिना मूलाधार से होकर सीधे ब्रह्मरन्ध्र को चला जाता है । १५६. षष्ठवक्त्र—यहाँ वक्त्र का अर्थ अवयव है आँख, कान, नाक, मुख और पायु को पंचवक्त्र कहते हैं । मेढ्रकन्द को जो गुदा के मूल में है षष्ठवक्त्र ( छठाँ अवयव ) कहते है । १६०. अधः कुण्डलिनी—लम्बिका से मूलाधार में वर्तमान कुण्डलिनी के १ ३/४ वलय तक का क्षेत्र अधः कुण्डलिनी का है । प्राण का प्रवाह अधः कुण्डलिनी के द्वारा लम्बिका से मूलाधार की ओर होता है । इस दशा को संकोच या वह्नि कहते हैं । प्राण और अपान का मिलकर सुषुम्नाधाम के द्वारा मूलाधार तक आ जाने का नाम अधः कुण्डलिनी है । १६१. वह्नि-विष—वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबंध हैं और विष का ऊर्ध्वकुण्डलिनी से । अधः कुण्डलिनी में प्रवेश ( आवेश ) संकोच अथवा वह्नि कहलाता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी में उठना विकास अथवा विष कहलता है । वह्नि का प्राण वायु से सम्बन्ध है और विष का अपान वायु से । जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है तब इस दशा को वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है । वह्नि शब्द वह धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है ‘ले चलना, ले जाना’ । अग्नि को वह्नि इसलिए कहते हैं क्योंकि वह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है उसे देवों त कले