प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ प्रत्यभिज्ञाहृदय जाती है। इस दशा में प्राण का मूलाधार तक वहन होता है (अर्थात् जाता है)। इसलिए उसे वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश विष कहलाता है। इस प्रसंग में विष शब्द का अर्थ जहर नहीं है। विष शब्द विष् धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है 'व्याप्त होना, फैल जाना'। अतः विष का अर्थ है प्रसर या विकास। जहर को विष इसलिए कहते हैं क्योंकि वह सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है। 'वह्नि और विष के मध्य में चित्त को फेंकना चाहिए'-यह कहने का तात्पर्य यही है कि जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं तब चित्त को वह्नि और विष के बीच में अर्थात् अधः कुण्ड- लिनी और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध कर देना चाहिए। निरुद्ध कर देने का तात्पर्य यह है कि वहीं उसे रोक देना चाहिए। १६२. स्मरानन्द—इस प्रकार जब चित्त अधः और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध किया जाता है तब मैथुन के आनन्द की अनुभूति होती है। यह परावृत्त कामानन्द है। मैथुन का संगम बाह्य है, यह संगम आन्तरिक है। १६३. इस स्थान पर इस सम्प्रदाय की यौगिक क्रिया का वर्णन है। मध्य के विकास से ही सिद्धि होती है। अणु अर्थात् जीव के लिए इसका अर्थ है सुषुम्ना में जो कि ईडा और पिंगला नाड़ियों के मध्य में है—प्राणशक्ति का विकास। मध्य की सिद्धि का एक उपाय है शक्ति का संकोच और विकास। संकोच और विकास के शाब्दिक अर्थ से इस यौगिक क्रिया का भाव नहीं व्यक्त हो सकता। यहां पर संकोच का निम्नलिखित तात्पर्य है : जब इन्द्रियों के द्वारा चित्त विषयों की ओर उन्मुख होता है, जब इन्द्रियां रूप, शब्द, गन्ध इत्यादि के ग्रहण में लगी होती हैं, तब चित्त को उनकी ओर से खींच कर भीतर की ओर उस आत्मतत्त्व की ओर लगा देना चाहिए जो कि सभी कार्यों का उद्भव और अधिष्ठान है। विकास का अर्थ है इन्द्रियों के बाहर खुले रहने पर भी भीतर की ओर लक्ष्य रखना अर्थात् भैरवी मुद्रा का अभ्यास। संकोच का भाव है बाह्य विषयों से प्रत्याहार। विकास का भाव इन्द्रियों के विषयों के प्रति उन्मुख रहने पर भी आन्तरिक चेतना पर ध्यान। संकोच और विकास का और अधिक संवर्धन किया जाता है ऊर्ध्वकुण्डलिनी के स्तर पर प्रसर-विश्रान्ति द्वारा। इस सन्दर्भ में प्रसर को विकास का और विश्रान्ति को संकोच का पर्याय समझना चाहिए। योगी सुषुम्ना में प्राणशक्ति का विकास करता है और भ्रूमध्य में उसका निरोध कर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के