भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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टिप्पणियाँ १३७ स्तर पर पहुँचता है। यहाँ वह प्रसर-विश्रान्ति का अभ्यास करता है। संकोच- विकास का संवर्धन अधःकुण्डलिनी में भी करना पड़ता है। अधःकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्धभाग में अनुप्रवेश संकोच अथवा वह्नि कहलाता है और अधःकुण्डलिनी के शेष अर्धभाग और अग्रभाग में वहाँ तक अनुप्रवेश जहां कि ऊर्ध्वकुण्डलिनी का पर्यवसान होता है विकास अथवा विष अथवा उन्मीलन समाधि कहलाता है। १६४. अनच्क—अच् = अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ = अर्थात् सभी स्वर। अनच्क का तात्पर्य है ककार, हकार इत्यादि का बिना स्वर के उच्चारण करना (क् ह्)। अनच्क उच्चारण का मुख्य भाव है किसी मंत्र पर ध्यान करते हुए उसके उद्गम तक पहुँच जाना जहाँ वह उच्चारणरहित है। १६५. प्राण हृदय से प्रारम्भ होता है और द्वादशान्त पर समाप्त होता है अर्थात् हृदय से बारह अंगुल के अन्त पर समाप्त होता है। हृदय से यहाँ तात्पर्य है 'उरः प्राचीर (डायफ्राम) का मध्य बिन्दु'। निभालन का तात्पर्य है चित्त का हृदय से प्राण के प्रारम्भ होने और द्वादशान्त पर समाप्त होने पर और अपान के द्वादशान्त पर प्रारम्भ होने और हृदय पर समाप्त होने पर लगाना। प्राण के उठने और ठहरने पर और इसी प्रकार अपान के उठने और ठहरने पर चित्त को लगाये रखना निभालन कहलाता है। यह बौद्धयोग के प्राणापान-स्मृति (पानापानसति) के समान है। यह 'शक्ति-द्वादशान्त या कौण्डली' कहलाता है। एक दूसरा द्वादशान्त ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर है जिसे 'शिव-द्वादशान्त या प्रक्रियान्त' कहते हैं। १६६. सुभगे (सुन्दरि) यह देवी को सम्बोधन करके कहा गया हैं। इस दर्शन में बहुत सी रहस्य की बातें शिव और देवी के संवाद के रूप में कही गयी है। १६७. उन्मेष का शब्दार्थ है खिलना, विकास। यह शैवागमयोग का एक पारिभाषिक शब्द है। इस ग्रन्थ में उन्मेषसम्बन्धी श्लोक की केवल एक पंक्ति दी हुई है। पूरा श्लोक इस प्रकार है :— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ इसका अर्थ निम्नलिखित है। जब कोई एक विचार में लगा हुआ है और दूसरे विचार का उदय होता है तब दोनों विचारों के सन्धिविन्दु के संवेदन को उन्मेष समझना चाहिए। इसको कोई स्वयं देख ले अर्थात् अनुभव कर ले।

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