प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ प्रत्यभिज्ञाहृदय चित्त का स्वभाव है एक विचार से दूसरे विचार की ओर क्रम से चलते रहना, किन्तु यदि कोई एक विचार के समाप्त होते ही और दूसरे विचार के उदय होने के ठीक पूर्व चित्तवृत्ति को विश्रान्त कर ले, तो वह उन्मेष भाव को प्राप्त कर सकता है। इसका भाव है दो विचारों या विकल्पों के बीच में जो संविद का स्पन्द है उसमें विश्रान्त होना अर्थात् दोनों विचारों का जो आधार या अधिष्ठान है उसमें ठहर जाना । उन्मेष की यह व्याख्या शाक्तोपाय दृष्टि से है। शाम्भवोपाय की दृष्टि से अपने अभीष्ट ध्येय पर ध्याने करते करते पारमार्थिक भाव का उदय होना 'उन्मेष' कहलाता है। १६८. इन श्लोकों में, रसानुभूति पर ध्यान करने के द्वारा परमानन्द के स्वरूप की अनुभूति के लिए तीन उपाय बतलाते गये हैं। (१) आस्वादधारणा : खान-पान के आस्वाद के मूल पर ध्यान करना । (२) शब्दधारणा-संगीत से प्राप्त आनन्द के मूल पर ध्यान करना । (३) मनस्तुष्टिधारणा—जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता होती है उसके मूल पर ध्यान करना । १६६. समावेश को समझने के लिए अभिनवगुप्त के तंत्रालोक के प्रथम आह्निक के २०५ पृष्ठ को देखें । वह इस प्रकार है :— आवेशश्चास्वतन्त्रस्य, स्वतद्रूपनिमज्जनात् । परतद्रूपता शम्भो- राद्याच्छक्त्यविभागिनः ( १.१७३ ) “आवेश ( समावेश ) का अर्थ है स्वातंत्र्यरहित परमित प्रमाता का अपने संकुचित रूप को डुबोकर अर्थात् नगण्य बनाकर स्वतंत्र चैतन्य अर्थात् परमशिव के साथ तादात्म्य कर लेना जो कि आद्या शक्ति से अभिन्न है। समावेश का भाव है अपने संकुचित रूप को विगलित कर परम शिव के रूप को ग्रहण कर लेना जो कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप है । १७०. निमीलन समाधि—यह आँख मूंद कर ध्यान करने पर आन्तरिक समाधि की वह दशा है जिसमें व्यक्तिगत चेतना (चित्त ) सर्वव्यापी चेतना (चित्) में विलीन कर दी जाती है। इसमें वेद्य या ज्ञेय नहीं रह जाता । उसका चित् के साथ ऐक्य हो जाता है। यह वास्तविक अन्तर्मुखता है और पूर्णाहन्ता की अनुभूति का मार्ग है । १७१. व्युत्थान—इसका शब्दार्थ है उठना । योग में इसका अर्थ है ध्यान के अनन्तर सामान्य चेतना की स्थिति में आना ।