भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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देखिए टिप्पणी सं. १७४ अभिनवगुप्त के अनुसार कला और भुवनों का रेखाचित्र KALĀS AND BHUVANAS ACCORDING TO ABHINAVA-GUPTA 5. ŚĀNTĀTĪTĀ 4. ŚĀNTĀ KALĀ 3. VIDYĀ KALĀ 2. PRATIṢṬHĀ KALĀ

  1. NIVṚTTI KALĀ / १. निवृत्ति कला २. प्रतिष्ठा कला ३. विद्या कला ४. शान्ता कला ५. शान्तातीता EXPLANATORY NOTE ON THE DIAGRAM रेखाचित्र का स्पष्टीकरण समस्त विश्व पाँच कलाओं में विभक्त है । १. निवृत्ति कला — यह निम्नतम कला है। यह मुख्यतः पृथ्वीतत्त्व की बनी हुई है। इसके अन्तर्गत १६ भुवन हैं। निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन 'कालाग्निरुद्र भुवन' कहलाता है। इसी का क्षेमराज ने 'कालाग्न्यादेः' में उल्लेख किया है। २. प्रतिष्ठा कला—निवृत्तिकला के बाद यह दूसरी कला है। इसमें जल तत्त्व से लेकर प्रकृतितत्त्व तक २३ तत्त्व हैं और ५६ भुवन हैं। ३. विद्या कला—यह तीसरी कला है। इसमें पुरुषतत्त्व से लेकर मायातत्त्व तक सात तत्त्व हैं और २८ भुवन हैं। ४. शान्ता कला—यह चौथी कला है। इसमें तीन तत्त्व हैं—शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव, और १८ भुवन हैं। ५. शान्तातीता कला—यह पाँचवीं कला है। इसमें केवल शिव और शक्ति तत्त्व हैं और कोई भुवन नहीं है। परमशिव तो सब कलाओं से अतीत है। भुवनों की कुल संख्या १६ + ५६ + २८ + १८ = ११८ है।