भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 151, कुल 187 में से

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टिप्पणियाँ १३६ १७२. क्रममुद्रा—इसकी दूसरी संज्ञा मुद्राक्रम भी है। इसका भाव ग्रन्थ में ही क्रमसूत्र में बतला दिया गया है। इसमें चित्त क्रम से बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की ओर झूलता रहता हैं। ‘आभ्यन्तर’ सर्वव्यापी चेतना या शिव प्रतीत होता रहता है और ‘बाह्य’ भी इस दशा में एक भिन्न जगत् नहीं किन्तु सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है। इस सन्दर्भ में ‘मुद्रा’ शब्द अवयवों और अंगुलियों के एक विशेष विन्यास या संस्थान के अर्थ में नहीं प्रयुक्त हुआ है। जिस अर्थ में उसका यहाँ प्रयोग हुआ है वह ग्रंथ में ही आगे दिया हुआ है। १७३. पराभट्टारिका रूपा अहन्ता। यह पूर्ण अहन्ता है। परा अहन्ता कहने का तात्पर्य है परमोत्कृष्ट विमर्श। विमर्श अर्थात् अहंबोध तीन प्रकार का है—पर, अपर और परापर। पर विमर्श शिव का है जिसमें पूर्ण अभेद है, मैं और यह, ज्ञाता और ज्ञेय में कोई भेद नहीं है। अपर विमर्श अणु (जीव, व्यक्ति) का है जिसमें ‘मैं’ और ‘यह’ में ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ में सर्वथा भेद है। परापर विमर्श शक्ति का है जिसमें भेदाभेद है अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद होने पर भी उसका अतिक्रमण होता रहता है। १७४. ‘कालाग्न्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य’—निवृत्तिकला के अन्तर्गत काला- ग्निभुवनेश से लेकर अन्तिम कला तक। निवृत्तिकला सृष्टि की निम्नतम कला है। शान्ताकलासृष्टि की उच्चतम कला है। यहाँ पर ‘कला’ का अर्थ है ‘सृष्टि का भाग’। सृष्टि की कलाओं को समझने के लिए संलग्न रेखाचित्र देखिए। १७५. संविद्देवताचक्रम्—संविद्देवतासमूह। समष्टि की दृष्टि से खेचरीचक्र, गोचरीचक्र, दिक्‌चरीचक्र और भूचरीचक्र संविद्देवता हैं। व्यष्टि की दृष्टि से परिमित प्रमाता, अन्तःकरण, बहिष्करण ओर प्रमेय संविद्देवता हैं। १७६ चमत्कार—सृष्टि क्रिया के अद्भुत आनन्द को चमत्कार कहते हैं। यहाँ पर इसका भाव है ‘अहंविमर्श’—पूर्णाहन्ता का आनन्द, समस्त सृष्टि को अहंभाव से समझने का आनन्द। यह अहंविमर्श प्रकाश के साथ एकसद्- भाव का परिणाम है। ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ के विषय में देखिए टि० २१। परमसत् प्रकाश—विमर्शमय है। वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में विश्व भी है और उसका शाश्वत अधिष्ठान भी है। १७७ प्रकाश के साथ एक सद्भाव—क्षेमराज ने यहाँ पर सत् का आरो- हणक्रम से वर्णन किया है। पहली अवस्था है—सवेद्य वा प्रमेय—जो कुछ भी ज्ञेय वस्तु है। दूसरी अवस्था है संवेदन वा प्रमाण अर्थात् ज्ञान। तीसरी अवस्था है—सदाशिव जिसकी चेतना शरीर इत्यादि परिच्छिन्न उपाधियों से एकीकृत नहीं रहती, प्रत्युत समस्त विश्व ही जिसका शरीर है। चरम

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