भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

टिप्पणियाँ १३६ १७२. क्रममुद्रा—इसकी दूसरी संज्ञा मुद्राक्रम भी है। इसका भाव ग्रन्थ में ही क्रमसूत्र में बतला दिया गया है। इसमें चित्त क्रम से बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की ओर झूलता रहता हैं। ‘आभ्यन्तर’ सर्वव्यापी चेतना या शिव प्रतीत होता रहता है और ‘बाह्य’ भी इस दशा में एक भिन्न जगत् नहीं किन्तु सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है। इस सन्दर्भ में ‘मुद्रा’ शब्द अवयवों और अंगुलियों के एक विशेष विन्यास या संस्थान के अर्थ में नहीं प्रयुक्त हुआ है। जिस अर्थ में उसका यहाँ प्रयोग हुआ है वह ग्रंथ में ही आगे दिया हुआ है। १७३. पराभट्टारिका रूपा अहन्ता। यह पूर्ण अहन्ता है। परा अहन्ता कहने का तात्पर्य है परमोत्कृष्ट विमर्श। विमर्श अर्थात् अहंबोध तीन प्रकार का है—पर, अपर और परापर। पर विमर्श शिव का है जिसमें पूर्ण अभेद है, मैं और यह, ज्ञाता और ज्ञेय में कोई भेद नहीं है। अपर विमर्श अणु (जीव, व्यक्ति) का है जिसमें ‘मैं’ और ‘यह’ में ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ में सर्वथा भेद है। परापर विमर्श शक्ति का है जिसमें भेदाभेद है अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद होने पर भी उसका अतिक्रमण होता रहता है। १७४. ‘कालाग्न्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य’—निवृत्तिकला के अन्तर्गत काला- ग्निभुवनेश से लेकर अन्तिम कला तक। निवृत्तिकला सृष्टि की निम्नतम कला है। शान्ताकलासृष्टि की उच्चतम कला है। यहाँ पर ‘कला’ का अर्थ है ‘सृष्टि का भाग’। सृष्टि की कलाओं को समझने के लिए संलग्न रेखाचित्र देखिए। १७५. संविद्देवताचक्रम्—संविद्देवतासमूह। समष्टि की दृष्टि से खेचरीचक्र, गोचरीचक्र, दिक्‌चरीचक्र और भूचरीचक्र संविद्देवता हैं। व्यष्टि की दृष्टि से परिमित प्रमाता, अन्तःकरण, बहिष्करण ओर प्रमेय संविद्देवता हैं। १७६ चमत्कार—सृष्टि क्रिया के अद्भुत आनन्द को चमत्कार कहते हैं। यहाँ पर इसका भाव है ‘अहंविमर्श’—पूर्णाहन्ता का आनन्द, समस्त सृष्टि को अहंभाव से समझने का आनन्द। यह अहंविमर्श प्रकाश के साथ एकसद्- भाव का परिणाम है। ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ के विषय में देखिए टि० २१। परमसत् प्रकाश—विमर्शमय है। वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में विश्व भी है और उसका शाश्वत अधिष्ठान भी है। १७७ प्रकाश के साथ एक सद्भाव—क्षेमराज ने यहाँ पर सत् का आरो- हणक्रम से वर्णन किया है। पहली अवस्था है—सवेद्य वा प्रमेय—जो कुछ भी ज्ञेय वस्तु है। दूसरी अवस्था है संवेदन वा प्रमाण अर्थात् ज्ञान। तीसरी अवस्था है—सदाशिव जिसकी चेतना शरीर इत्यादि परिच्छिन्न उपाधियों से एकीकृत नहीं रहती, प्रत्युत समस्त विश्व ही जिसका शरीर है। चरम

१४० प्रत्यभिज्ञाहृदय अवस्था है महेश्वर जिसकी आत्मसंवित्ति में समस्त सृष्टि समाविष्ट है और जिसका प्रकाश से एक सद्भाव है। १७८ आदिक्षान्तामायीयशब्दराशिपरमर्श—'अ' लेकर 'क्ष' तक अमा- यीय शब्द राशि की स्मृति के कारण—तंत्र के अनुसार पराशक्ति (चरम ईश्वरीय सर्जनात्मक शक्ति जिसके द्वारा विश्व का आविर्भाव होता है) और परावाक् (चरम ईश्वरीय शब्द जो समस्त शब्दराशि का उत्स हैं) एक ही है। प्रत्येक पद वाचक कहलाता है और प्रत्येक अर्थवाच्य कहलाता है। वाच्य वा अर्थ ईश्वरीय शब्द का आशय मात्र है, वह केवल ईश्वरीय शब्द का दृश्य रूप है। ईश्वरीय शब्द अमायीय है अर्थात् माया के क्षेत्र से परे है। शब्द दो प्रकार के हैं—मायीय (माया के क्षेत्र के) और अमायीय (माया के क्षेत्र से परे)। मायीय शब्द वे हैं जिनका अर्थ लौकिक परिपाटी के अनुसार आरोपित होता है। वे विकल्प मात्र हैं। अमायीय शब्द वे हैं जो निर्विकल्प हैं जिनका अर्थ सत्य है, जो कल्पना, आरोपण अथवा रूढ़ि के परिणाम नहीं हैं, जो चिन्मय हैं। परामर्श—जो कुछ वाच्य-वाचक जगत् है वह अमायीय शब्दराशि के रूप में महेश्वर में वर्तमान है। सृष्टि महेश्वर की अपनी शब्दराशि की स्मृति मात्र है, और कुछ नहीं। १७६, जगदानन्द—जगत् रूपी आनन्द। जगदानन्द इस दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में फूट निकलता है। इस दर्शन में जगत महेश्वर के आनन्द की च्युति नहीं है, प्रत्युत जगत् उसके आनन्द की अभिव्यक्ति है। जगत् उसके आनन्द का दृश्य रूप है। अभिनव गुप्त के जादानन्द के विषय में निम्नलिखित श्लोक हैं:— यत्रकोऽपि व्यदच्छेदोनास्तियद्विश्वतः स्फुरत् यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्तिभावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शंभुरुक्तवान् ॥ (तंत्रः खं० ३, ५ आ० ५०-५१) सब ओर से प्रकाशमान होने के कारण जिसमें कोई विभाग नहीं है, जिसमें चेतना अक्षुण्ण और अविकल है अर्थात् जिसमें चेतना ही अपने को प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में अभिव्यक्त कर रही है, जो महेश्वर के आनन्दरूपी अमृत से प्रसारित है जिसमें ध्यान इत्यादि की कोई आवश्यकता ही नहीं है वही जगदानन्द है—ऐसा मुझको शम्भु ने बतलाया है। (शम्भु अभिनवगुप्त के गुरु का नाम है जिन्होंने उनको त्रिकदर्शन सिखलाया था)।

टिप्पणियाँ १४१ जयरथ ने जगदानन्द के भाव को अपनी व्याख्या में इस प्रकार व्यक्त किया है :- जगता निजानन्दाद्यात्मना विश्वेन रूपेणानन्दो यत्र यतश्चेति जगदानन्द- शब्दवाच्यम् । “महेश्वर का अपना आनन्द जगत् के रूप में सब ओर से दृश्यमान होना जगदानन्द है”। १८०. अकुल—“कुलं शक्तिरितिप्रोक्तं, अकुलं शिव उच्यते”। (स्वच्छन्द तंत्र) आगम में शक्ति को 'कुल' कहते हैं और शिव को 'अकुल'। कुल अर्थात् समस्त जगत् शक्ति है। जो जगत् मात्र में लुप्त नहीं है, जगत् मात्र में खो नहीं गया है, वह 'अकुल' अर्थात् शिव है। 'अ' अक्षर मातृकाचक्र की दृष्टि से 'अनुत्तर' या 'अकुल' का द्योतक है। १८१. प्रत्याहार—यहाँ पर प्रत्याहार शब्द संस्कृत व्याकरण के एक पारि- भाषिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सूत्र अथवा सूत्रों के पहले अक्षर और अंतिम अक्षर को मिलाकर जो एक शब्द बनता है उसे प्रत्याहार कहते हैं। उदा- हरणार्थ अइउण्, ऋऌक्, एओ०, ऐऔच् सूत्रों का पहला अक्षर 'अ' है और अन्तिम अक्षर 'च्' है; इन दोनों को मिलाकर अच् प्रत्याहार बनता है। अच् कहने से अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, और औ इन अक्षरों का बोध होता है। प्रत्येक सूत्र का अन्तिम हलन्त अक्षर केवल प्रत्याहार बनाने के लिए है। वह किसी अक्षर का द्योतक नहीं है। इस प्रसङ्ग में पहले अक्षर 'अ' और अन्तिम अक्षर 'ह' को मिलाने से 'अह्' प्रत्याहार बनता है जो कि संस्कृत के 'अहं' शब्द का सूचक है जिसका अर्थ होता हैं 'मैं, आत्मा'। 'अह्' प्रत्याहार के भीतर अ से ह तक संस्कृत भाषा का प्रत्येक अक्षर समाविष्ट है। आगमकी दृष्टि से प्रत्येक अक्षर वाचक है जो एक वाच्य को सूचित करता है अर्थात् प्रत्येक अक्षर एक पदार्थ का द्योतक है अतः 'अह्' प्रत्याहार में सभी अक्षर आ जाते हैं, अतः 'अह्' वा 'अहं' विश्व के सभी पदार्थों का सूचक है। परम शिव की 'अह' (मैं) की अनुभूति में समस्त विश्व अव्याकृत अभिन्न रूप में निहित है। १८६. बिन्दु—बिन्दु का अर्थ है बिन्दी, नुकता। अनुत्तर अर्थात् परमशिव के प्रशान्त महासागर में क्षोभ का, तनाव का एक कण उठता है। यह बिन्दु है। इसमें भावी विश्व अव्यक्त रूप से निहित रहता है। इस बिन्दु को 'घनीभूता शक्ति' कहते हैं। यह अभी पदार्थों में व्यक्त नहीं हुई है। यह चिद्घन है, घनीभूतसंवित् है जिसमें भावी समस्त विश्व और प्राणी सम्भाव्यरूप में, अविशिष्ट रूप में, अव्याकृतरूप में

१४२ प्रत्यभिज्ञाहृदय निहित हैं। इसलिए व्याख्याकार क्षेमराज ने लिखा है कि 'अ' और 'ह' सम्पु- टीभूत रूप में समस्त सम्भाव्य विश्व को संगृहीत किये हुए अनुत्तर में, परम- शिव में, एक अविशिष्ट बिन्दु के रूप में पड़ा रहता है। बिन्दु अविशेष का, अभेद का द्योतक है। (संस्कृत) भाषा में बिन्दु अनुस्वार के द्वारा अक्षर के ऊपर एक बिन्दी रखकर व्यक्त किया जाता है। जैसा कि कहा जा चुका है, 'अ' और 'ह' में समस्त विश्व संगृहीत है। 'अ' और 'ह' के अविभाग को व्यक्त करने के लिए उस पर अनुस्वार का बिन्दु रखा हुआ है और इस प्रकार 'अह' 'अहं' के रूप में वर्तमान रहता है। यह अहं परमशिव का विमर्श है जो इस बात का द्योतक है कि समस्त विश्व बीज रूपेण शिव में निहित है और उससे अभिन्न है। 'अ' शिव का प्रतीक है, 'ह' शक्ति का प्रतीक है, उसपर जो अनुस्वार बिन्दु है, वह इस बात का द्योतक है कि यद्यपि शिव अपनी शक्ति के द्वारा पृथ्वी तक में व्यक्त है, वह इस व्यक्तीकरण से विभक्त नहीं हो जाता, वह स्वरूपतः अविभक्त, पूर्ण रहता है। इसी बात को क्षेमराज ने 'अविभागवेदनात्मक बिन्दुरूपतया' इन शब्दों में स्पष्ट किया है। १८३. प्रकाशस्य-मूल में जो 'प्रकाशस्य' शब्द है, उसका यहाँ पर अर्थ है 'घटसुखादिवेद्यप्रकाशस्य' घट (वाह्य) और सुख (आन्तरिक) जो कुछ भी वेद्य रूपी प्रकाश है उसकी (विश्रान्ति)। १८४. महाह्रद-महासरोवर। परम अहंविमर्श अथवा परम आध्यात्मिक आत्मचेतना को 'महाह्रद' कहा है। इसको 'महा' इसलिए कहा है क्योंकि यह अतिगंभीर है, स्वच्छ है और अपरिच्छिन्न है। १८५. 'सम्बन्ध स्थापित करने का भाव है' 'परमशिव के अहंविमर्श से तादात्म्य स्थापित करना।' १८६. 'विवरणकार' से कल्लटाचार्य का निर्देश किया है जो वसुगुप्त के शिष्य थे और जिन्होंने 'स्पन्दकारिका' पर एक वृत्ति लिखी थी। कल्लट ईसवी ६वीं शती में हुए थे। १८७. संवित्तिदेवताचक्र-जब इन्द्रियाँ पूर्ण रूपेण पवित्र होकर देवतातुल्य हो जाती हैं तब उनके चक्र (समूह) को 'सांवित्तिदेवताचक्र' कहते हैं। १८८. 'चक्रवर्ती' शब्द में श्लेष है। एक अर्थ है चक्र (इन्द्रियसम्मूह) का शासक। दूसरा अर्थ है 'सार्वभौम सम्राट्'।

पारिभाषिक शब्दों का कोश अ अ अनुत्तर, शिव अकुल शिव, जो कुल अर्थात् शक्ति नहीं है, शिव है। अख्याति अज्ञान अधःकुण्डलिनी लम्बिका से लेकर मूलाधार के ३ १/२ वलय तक कुण्डलिनी का क्षेत्र (दे० टि० १६०) अधोवक्त्र गुदा के मूल में स्थित मेढ्रकन्द अनचक शब्दार्थ-व्यञ्जन का बिना स्वर के उच्चारण, गूढार्थ-किसी मंत्र की मानस अवस्था पर ध्यान जहाँ उसका उच्चारण नही होता। अनन्तभट्टारक मंत्रप्रमाताओं का अधिष्ठाता। अन्तकोटि अन्तिम स्थल; हृदय से बारह अंगुलियों के अन्तर का स्थल जिसे द्वादशान्त कहते हैं। अन्तर्मुखी भाव चित्त का भीतर की ओर मुड़ना, प्रत्यग्वृत्ति। अनाश्रितशिव शिव की वह अवस्था जिसमें कोई ग्राह्य नहीं है, जिसके सम्मुख केवल शून्य है, विश्व प्रति- षिद्ध हो गया है। अनुग्रह दैवीकृपा अनुत्तर जिससे बढ़कर और कोई नहीं है, परम असीमसत्, परमार्थ। अपर निम्न अपवर्ग मोक्ष अपान बाहर से भीतर की ओर, गुदा की ओर चलनेवासी वायु। अमायीय माया के प्रभाव से परे; अमायीय शब्द वह है जिसमें पद और अर्थ एकात्म होते हैं। अर्थ उद्देश्य; लक्ष्य; इन्द्रियों का विषय। अलंग्रास ग्राह्य को पूरी तौर से निगल जाना अर्थात् उसको इस प्रकार आत्मसात् कर लेना कि वह आत्मचेतना से भिन्न न जान पड़े।

१४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय अव्यक्त अप्रकट; अदृश्य, अनाविर्भूत । असत् जिसका अस्तित्व न हो, सत् से विपरीत । अहन्ता अहं अर्थात् मैं की चेतना । अहंभाव मैं का भाव, मैं की अनुभूति । आ आणवमल अणु अर्थात् जीव का जन्मजात अज्ञान, वह आद्य परिमितता जिसके द्वारा सार्वभौम चेतनता जीव बन जाती है, बोध से शक्ति चली जाती है और शक्ति से बोध चला जाता है और इस प्रकार अपूर्णता का बोध होता है। आत्मविश्रान्ति आत्मा में, अपने में विश्राम या ठहराव । आत्मसात्कार अपने में समीकरण; स्वांगीकरण । आदिकोटि प्रथम कोटि; हृदय जहाँ से प्राण उमड़ता है । आनन्द आनन्द; शक्ति का स्वरूप । आभासन शब्दार्थ-आभास, गूढ़ार्थ-सृष्टि । आर्हत जैन । आश्यानता सिमट जाने की स्थितिः सूख जाने की स्थिति; ठोस हो जाने की स्थिति । इ इच्छा सदाशिव की प्रधान चेतना । इदन्ता इदं (यह) की चेतना, यह का परामर्श । ई ईश्वरतत्त्व शिव से गिनने पर (शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर) चौथा तत्त्व; ईश्वर तत्त्व में अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों परामर्श (चेतना) स्फुट रहता है । इसमें अहं और इदं दोनों की चेतना उभरी हुई रहती है । ईश्वरभट्टारक ईश्वरतत्त्व में व्यवस्थित मंत्रेश्वरों का अधिष्ठाता । उ उदान वह प्राण जो ऊपर की ओर जाता है; वह प्राण वा शक्ति जो सुषुम्ना में होती हुई ऊपर

१० पारिभाषिक शब्दों का कोश १४५ की ओर चलती है और आत्मिक चेतना घटित करती है । उद्वमन्ती शब्दार्थ-वमन करती हुई. भावार्थ—बाहर करती हुई, व्यक्त करती हुई । उन्मेष शब्दार्थ-आँख का खुलना। भावार्थ-सृष्टि का प्रारम्भ । शैवयोग में-आत्मिक चेतना का स्फुरण या विकास जो कि विचारों की स्पन्दभूमि या अधिष्ठान है । उन्मीलन शब्दार्थ-आँख का खुलना; भावार्थ-अव- स्थित का प्रकटीकरण, व्यक्त होना । उन्मीलन समाधि चित्त की वह स्थिति जिसमें आँख खुले रहने पर भी बाह्य जगत् सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है । ऊ ऊर्ध्वकुण्डलिनी जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश कर जाते हैं, तब ऊपर के भाग की कुण्डलिनी शक्ति । क कंचुक कोश करणेश्वर्यः खेचरी-गोचरी,-दिक्-चरी-भूचरी चक्र । कला कर्तृत्व, परिमितकर्तृत्व, अभिव्यक्ति की प्रावस्था, अंश, अक्षर या शब्दांश (ह कला- पर्यन्त) । कुल शक्ति कारण किसी का हेतुः वह जिससे कार्य की उत्पत्ति हो । कार्ममल कर्म के परिणामस्वरूप चित्त में अवस्थित वासना या संस्कार का मल । कार्य कारण का परिणाम काल वह शक्ति जिससे समय या क्रम निष्पन्न होता है । कालाग्नि निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन (दे० टि० १७४)

१४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय कुल शक्ति कुलाम्नाय शाक्त शास्त्र या सिद्धान्त क्रिया कार्य, शुद्धविद्या की शक्ति ख खेचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता से सम्बद्ध शक्ति, वह शक्ति जो खे (आकाश में) चरी (चलने वाली) है—आकाश इस सन्दर्भ में चेतना का प्रतीक है : ख्याति ज्ञान ग गोचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता के अन्तःकरण से सम्बद्ध। 'गो' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय, अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, अतः गोचरी अन्तःकरण से सम्बद्ध है। ग्राहक ज्ञाता, प्रमाता, विकल्पमय जीव ग्राह्य ज्ञेय : विषय । च चमत्कार पूर्णाहन्ता का आनन्द : कलाजन्य आनन्द का अनुभव । चरमकला शान्त्यतीत कला अथवा शान्तातीत कला, अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट अवस्थान । चार्वाक भौतिकवादी; अनात्मवादी, यदृच्छावादी स्वभाववादी। चार्वाक दर्शन भौतिकवादी-अनात्मवादी-यदृच्छावादी दर्शन चित् शुद्ध परम निरूपाधिक चैतन्य सब विकारों का अविकृत अधिष्ठान । चित्त चितिशक्ति के संकोच से जन्य सत्वप्रधान- स्वरूपी चेतना; मायाप्रमाता का स्वरूप । चेतन आत्मा : परमेश्वर, चैतन्यविशिष्ट जीव, प्राणी । चेत्य ज्ञेय, चेतना का विषय ।

पारिभाषिक शब्दों का कोश १४७ छ छेव अनच्क की ध्वनि से प्राण और अपान का निरोध ज जगत् गच्छति इति जगत्-जो बराबर चलता रहे, स्थायी न हो। जगदानन्द आत्मा या महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में अभिव्यक्त है। जाग्रत् जागते रहने की अवस्था; वह अवस्था जिसमें जीव शब्द, स्पर्श इत्यादि विषयों का ग्रहण करता रहता है। जीव देहावच्छिन्न चैतन्य, जीवात्मा। जीवन्मुक्ति देहमें रहते हुए, जीते जी हो जानेवाली मुक्ति ज्ञान सच्चा बोध; ईश्वर की शक्ति त तत्त्व वहपन, किसी वस्तु का वस्तुत्व, सार, आद्य अथवा मूलरूप तनुता क्रमशः कम होता जाना, सूक्ष्मता, प्रह्सन, लघूकरण तमस् प्रकृति का स्थित्यात्मक गुण, मोह तर्कशास्त्र ऊहापोह का शास्त्र, युक्तिशास्त्र तांत्रिक तंत्र का अनुयायी त्रिक तीन-(१) शिव, (२) शक्ति, (३) नर, अथवा पर (१), परापर (२), अपर (३) का दर्शन वा शास्त्र तुरीय जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति से परे चेतना की चौथी अवस्था जो तीनों अवस्थाओं को एक सूत्र में बाँधती है, अविकल चेतना मनोवैज्ञानिक प्रमाता से भिन्न दृक् चैतन्य, साक्षिचैतन्य। तुर्य तुरीय तुर्यातीत तुर्य से परे चेतना की अवस्था जिसमें तीन- जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का भेद

१४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय समाप्त हो जाता है, वह आनन्दमय शुद्ध चेतना जिसमें कोई विकार नहीं होता, जिसमें विश्व अपना आत्मा ही जान पड़ता है। द दर्शन तत्त्वज्ञान करानेवाला शास्त्र। दिक्‌चरी दिशाओं में चलनेवाली, वामेश्वरी शक्ति का वह प्रकार जो बहिष्करण अर्थात् बाह्येन्द्रियों से सम्बद्ध है। दिक् का अर्थ है देश या दिशा। बाह्येन्द्रियों का सम्बन्ध देश से है। इसलिए बहिष्करण दिक्‌चरी शक्ति का क्षेत्र हैं। देश फैलाव, दिक् न नित्यत्व सनातनत्व निभालन देखना, मानसिक अभ्यास निमीलनसमाधि ध्यान की वह आन्तरिक अवस्था जिसमें व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना में समाहित हो जाती है। निमेष पलक मारना, विश्व का परम शिव में लीन हो जाना। नियति कार्य-कारण द्वारा संकोच, देश-संबंधी संकोच। नैयायिक न्यायशास्त्र का विद्वान् या न्याय का अनुसरण करनेवाला। प पंचकृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह ये शिव के पाँच कृत्य अथवा योगी के आभासन, रक्ति, विमर्शन, बीजावस्थापन, विलापन-ये पाँच कृत्य। पति प्रभु, शिव पतिदशा परप्रमातृदशा, शुद्धाध्वप्रमातृता, मुक्ति। पर सर्वोत्कृष्ट परप्रमाता सर्वोत्कृष्ट ज्ञाता, परमशिव

पारिभाषिक शब्दों का कोश १४६ परमशिव परमसत्, परमार्थ, अनुत्तर, विश्वोत्तीर्ण- विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशघन शिव । परमार्थ सर्वोत्कृष्टसत्, तात्विकसत्य, यथार्थतत्व, सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य । परापर पर (परमार्थ, अद्वय) और अपर (भेद) दोनों, सर्वथा अद्वय और सर्वथा भेद दोनों के बीच की अवस्था, भेदाभेद-भेद के भीतर अभेद । परामर्श मानसिक पकड़, अनुभव, बोध, स्मरण करना । पराशक्ति परमशिव की सर्वोत्कृष्टशक्ति, चिति, पार- मेश्वरीस्वातंत्र्यशक्ति । परावाक् परमशिव की चित्-स्पन्द रूपी शक्ति : अव्यक्त शब्द; विश्वचेतना, किसी अन्य की अपेक्षा न करती हुई अहंपरामर्शमयी पराशक्ति, परमा- न्दात्मक स्वातंत्र्यशक्ति । परिच्छन्न परिसीमित । परिणाम विकार, एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त होना, रूपान्तर होना । पशु अविद्या इत्यादि पाश में बँधा हुआ जीव, अज्ञानी । पश्यन्ती परमशिव का होनेवाले विश्व का अविशिष्ट रूप में ईक्षण, वाक्शक्ति की सर्जन की उन्मुखता जिस अवस्था में वाच्य (अर्थ) और वाचक (पद) अभिन्न रहते हैं । पांचरात्र वैष्णवदर्शन, इस दर्शन का अनुयायी पांचरात्रिक वैष्णव दर्शन वा मार्ग का अनुयायी पाश बन्धन, रस्सी पुर्यष्टक पंचतन्मात्रा, बुद्धि, अहंकार और मन—इन आठों की पुरी वा समूह, सूक्ष्मशरीर । पूर्णत्व सर्वोत्तम अवस्था । पूर्णाहन्ता पूर्ण अहंचेतना जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय का कोई भेद नहीं रहता । पृथिवी पंचमहाभूतों में ठोस तत्त्व । प्रकाश आत्माभिव्यक्ति-तत्त्व, चैतन्य जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है ।

१५० प्रत्यभिज्ञाहृदय प्रकृति बुद्धि से लेकर पृथिवी तक की अभिव्यक्ति का उत्स वा प्रभव। प्रत्यभिज्ञा पहचान, यह ज्ञान कि परमेश्वर और जीवात्मा एक है। प्रत्याहार सूत्र के प्रथम वर्ण (अक्षर) और अन्तिम निर्देशनात्मक वर्ण (अक्षर) के संयोग से बना हुआ एक शब्द जो कि कई वर्णों का सूचक होता है। (दे० टि० १७५)। योग की वह क्रिया जिसमें इन्द्रियों को विषयों से हटाकर निरुद्ध किया जाता है। प्रथ विस्तृत होना, विकसित होना, प्रदर्शित होना प्रथा बढ़ने, फैलने, विकसित होने, प्रदर्शित होने का ढंग, रीति, परिपाटी। प्रमाण प्रमा (सच्चे ज्ञान) का करण या साधन; सबूत। प्रमाता ज्ञाता, प्रमाण द्वारा किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला, अनुभव करनेवाला। प्रमेय प्रमा या ज्ञान का विषय। प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली मायातत्व में अवस्थित शून्य का प्रमाता। प्रसर फैलाव, शिव का अपनी शक्ति द्वारा विश्वरूप में अभिव्यक्ति। प्राण जीवन शक्ति, प्रश्वासवायु। प्राणायाम श्वास-प्रश्वासगति का नियमन। ब बन्ध बन्धन, योग की वह क्रिया जिसमें शरीर के कुछ भाग संकुचित करके एक विशेष स्थिति में परिबद्ध कर लिये जाते हैं। बल इस दर्शन में बल का अर्थ है 'चिद्बल'-चित् अथवा आत्मा की शक्ति। बहिर्मुखता चेतना की बाहर की ओर उन्मुखता, पराक्चेतना। बहिर्मुखी भाव बहिर्मुखता की अवस्था या दशा।

पारिभाषिक शब्दों का कोश १५१ बिन्दु (विन्दु) बूंद, नुक्ता, आतिभौतिक बूंद अर्थात् घनी- भूता शक्ति जो कि एक अविशिष्ट विन्दु में संहृत होकर सर्जन के लिए उन्मुख है, पर प्रमाता, अनुस्वार जो कि अहं के ऊपर बिन्दु रूप में रखा हुआ (अहं) यह संकेत करता है कि शिव 'अ' से लेकर 'ह' तक जगत् में विभिन्न रूप से अभिव्यक्त होने पर भी अभिन्न है (दे० टि० १७६) । बीजावस्थापन बीज का रखना, गूढ़ार्थ-विलय अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को संगोपित या छिपा रखना । बुद्धि व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका चेतना, चेतना की वह स्थिति जिसमें जीव अंधकार से जग जाता है । बैन्दवी कला बैन्दवी-बिन्दु सम्बन्धी-इस प्रसंग में बिन्दु का अर्थ है परप्रमाता; कला-कौशल, स्वातंत्र्य । बैन्दवीकला परमशिव का वह कौशल, वह स्वातंत्र्य जिससे प्रमाता सदा प्रमाता बना रहता है और कभी प्रमेय में अन्तर्भूत नहीं होता । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना, मध्यप्राण नाडी ब्रह्मारन्ध्र सहस्रार चक्र ब्रह्मवाद (इस दर्शन में) शांकरवेदान्त । भ भाव बाह्य अथवा आन्तरिक सत्ता, विषय । भुवन होना, होने का स्थान, लोक, आलय । भूचरी वामेश्वरी शक्ति का एक प्रकार जो कि भावों से सम्बद्ध है । भूमिका अभिनेय अंश, गृहीतकार्य । भैरव परमशिव । यह भ, र, और व की अक्षरमुष्टि है । भ 'भरण' (स्थिति) का द्योतक है, र 'रवण' (संहार) का द्योतक है और व 'वमन' (सृष्टि) का द्योतक है । भोग सुख-दुःख का अनुभव-कभी कभी सुखमात्र के संकुचित अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त होता है ।

१५२ प्रत्यभिज्ञाहृदय भोक्ता सुखदुःख का अनुभव करनेवाला । म मध्य संवित्, शुद्ध अहन्ता, सुषुम्ना अर्थात् मध्यनाड़ी मध्यधाम सुषुम्ना, ब्रह्मनाड़ी मध्यमा स्थूल अभिव्यक्ति के पूर्व बुद्धिनिष्ठ वाक्शक्ति। मध्यशक्ति संवित् शक्ति मन्त्र वह प्रमाता जिसने शुद्ध विद्या का साक्षात्कार कर लिया है; विद्यातत्त्व में अध्यासीन प्रमाता; वह शब्द या शब्दसमूह जिसका जप या ध्यान किया जाय । मन्त्रमहेश्वर वह प्रमाता जिसने सदाशिवतत्त्व का साक्षा- त्कार कर लिया है । मन्त्रेश्वर वह प्रमाता जिसने ईश्वरतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है । महामन्त्र शुद्ध चेतना का, पूर्णाहन्ता का मन्त्र । महार्थ परमोत्कृष्ट लक्ष्य, शुद्धपूर्णाहन्तापद, कौल- साधना । महेश्वर परमेश्वर, परमशिव, अनुत्तर माध्यमिक बौद्ध मध्यमकदर्शन का अनुयायी । माया 'मा' धातु से निष्पन्न 'मापना' । अनन्त की मेय और परिच्छिन्न बनाने की, आवरण और विक्षेप की शक्ति, शुद्धविद्या से नीचे का तत्त्व, पाँच कञ्चुकों की योनि । मायाप्रमाता माया द्वारा वशीभूत जीव । मायीयमल माया के द्वारा मल या संकोच जिससे जीव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर बनते हैं और भेद की प्रतीति होती है । माहैश्वर्य महेश्वर की शक्ति । मीमांसक मीमांसा दर्शन का अनुयायी । मुक्ति आत्मतत्त्व का परिज्ञान, अज्ञानग्रंथि के भेद से स्वात्मशक्ति की अभिव्यक्ति, परमशिवी भाव । मुद्रा आध्यात्मिक आनन्द (मुद) को देनेवाली (रा) स्थिति, तुर्यचेतना में विश्व को मुहरबन्द

पारिभाषिक शब्दों का कोश १५३ करनेवाली दशा (मुद्रयति इति), हाथ, गर्दन इत्यादि की विशेषभावसूचक स्थिति, योग में ध्यान के सहायक रूप में कुछ अवयवों का नियन्त्रण । मुद्राक्रम (अथवा क्रममुद्रा) तुरीया चितिशक्ति, वह अवस्था-विशेष जो सृष्टि-स्थिति-संहृति रूपी चक्र के क्रम को मुद्रित करता है अर्थात् आत्मसात् करता है, वह अवस्था विशेष जिसमें चित्त में समावेश के वेग से आभ्यन्तर और बाह्य में आत्मा और विश्व में क्रम से एकरूपता अर्थात् शिवात्मकता की संसिद्धि होती है । मेय भौतिक ज्ञेय, विषय, भौतिक पदार्थ । मोक्ष दे० मुक्ति र रक्ति आस्वाद, आनन्द, गूढ़ार्थ-स्थिति । रजस् प्रकृति का प्रवृत्तिरूपीगुण । राग माया का एक कंचुक जिसके द्वारा पूर्णत्व परिछिन्न हो जाता है और विषय-विशेष के लिए अभिलाषा उत्पन्न होती है । व वह्नि (वहू-ले जाना) शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द जिसका अर्थ है अःधकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्ध भाग में पूर्ण रूप से प्रवेश करना दे० टि० १५७ । वाचक शब्द, संकेत । वाच्य जिसका अभिधाशक्ति से बोध हो, पदार्थ । वामेश्वरी परमशिव की वह शक्ति जो कि विश्व का वमन करती है, अर्थात् परमशिव से विश्व को बाहर प्रक्षिप्त करती है और इस प्रकार वाम चेतना अर्थात् अभेद में भेद उत्पन्न करती है । वाह सुषुम्ना की बाईं ओर ईडा नाड़ी में बहते हुए प्राणवायु और दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी में बहते हुए अपान वायु की समुच्चयात्मक संज्ञा वाह है ।

१५४ प्रत्यभिज्ञाहृदय विकल्प विभिन्नता, भेदयुक्त ज्ञान, प्रत्ययन, कल्पना । विकल्पनम् चित् की भेद-ज्ञान की क्रिया । विकल्पक्षय विकल्पों का विलोप । विकास खिलना, प्रसार । विग्रह शरीर, रूप, आकार । विग्रही शरीरी, शरीरयुक्त । विद्या परिच्छिन्न ज्ञान । विभूति वैभव, महत्ता, अलौकिक शक्ति । विमर्श शब्दार्थ-अनुभव, ज्ञान इस शास्त्र में पारि- भाषिक अर्थ-परम शिव की ज्ञान क्रियात्मक आत्मसं वित्ति-रूपी-शक्ति जिससे सृष्टि होती है विमर्शन आन्तर्बोध, गूढ़ार्थ-संहार । विलय संगोपन, तिरोभाव । विलापन संहार, (गूढ़ार्थ) अनुग्रह । विश्व समग्र ब्रह्माण्ड, समग्र । विश्वमय विश्वात्मक समग्र ब्रह्माण्ड में अन्तर्व्याप्त, सर्वव्यापी, अन्त- र्वर्ती, विश्वानुग । विश्वोत्तीर्ण परात्पर, भौतिक संसृति से परे, अतिवर्ती विश्वातिग । विष यह शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द है । अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश 'विष' कहलाता है। विज्ञानाकल वह व्यक्ति जो माया से तो ऊपर है, किन्तु शुद्धविद्या से नीचे है, जिसमें ज्ञान है किन्तु कर्तृत्व नहीं है । वह कार्म और मायीय मल से मुक्त होता है किन्तु अभी आणव मल से मुक्त नहीं है । वैखरी शक्ति जो स्थूल, भौतिक अक्षर में व्यक्त है । वैष्णव विष्णु का अनुयायीः वैष्णवदर्शन और प्रक्रिया का अनुयायी । व्यान वह वायु या प्राण जो चारों ओर व्याप्त है । व्यापकत्व सर्वव्यापिता । व्यामोहितता मोह ।

पारिभाषिक शब्दों का कोश १५५ व्युत्थान शाब्दिक अर्थ उठना, योग का पारिभाषिक शब्द-'समाधि के बाद सामान्य चेतनावस्था में आ जाना।' श शक्ति शिव का अन्तर्बल जिसके द्वारा वह पंचकृत्य करता है। शक्तिपात किसी शिष्य या साधक पर शक्ति का गिराव, अनुग्रह। शक्तिप्रसर शक्तिविकास, समाधि से साधारण दशा में आने पर भी समाधि के अनुभव को बनाये रखना। शक्तिविकास इन्द्रियों के विषयों की ओर खुले रखने पर भी आन्तरिक सत्य पर एकाग्रता को बनाये रखना। शक्तिविश्रान्ति समाधि में निमज्जित होना और उस दशा में टिके रहना। शक्तिसंकोच इन्द्रिय व्यापार से चित्त को हटाकर आन्तरिक सत्य की ओर मोड़ना। शब्दब्रह्म चरमसत् जिसका स्वरूप स्पन्दन है जिसमें पद और अर्थ एक हैं और जिसका मानवीय शब्द स्थूल प्रतिरूप है (दे० टि० ७२-७१)। शासन शास्त्र शिव सत्, परमार्थ, भद्र शिवतत्त्व ३६ तत्त्वों में का आदितत्त्व जिसका लक्षण है चित् स्वरूप। शुद्धविद्या शिव से गिनने पर पाँचवा तत्त्व जिसका परा- मर्श है 'इदं च अहं च'। दे० टि० १८ में ३६ तत्त्व। शुद्धाध्व अतिजागतिक सत्ता, प्रथम पाँच तत्त्वों की अभिव्यक्ति। शून्य रिक्त, वह अवस्था जिसमें किसी पदार्थ का अनुभव नहीं होता। शून्यप्रमाता केवल शून्य अर्थात् रिक्त का अनुभव करने वाला, प्रलयांकल।

१५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ष षष्ठवक्त्र छठवाँ अवयव, गुदा के मूल के पास का मेद्रकंद स संवित् चेतना, परम चेतना । संवित् देवता समष्टि की दृष्टि से-खेचरी, गोचरी, दिक्- चरी और भूचरी संवित् देवता है, व्यष्टि की दृष्टि से आन्तरिक और बाह्य इन्द्रियाँ संवित् देवता हैं। संसार जगत्, जन्म-मरण । संसारी जीव जिसका संसरण ( जन्म-मरण ) होता रहता है। संसृति गमनागमन, जन्म-मरण का क्रम। संहार बटोर लेना, जगत् का शिव में लय । सकल देव से लेकर कीट तक सभी जीव जो माया- तत्त्व में हैं। इन्हें अपने आत्मा का बोध नहीं होता और इनमें भेद-बुद्धि बनी रहती है। सत् अस्तित्व जिसका स्वरूप चित् है। सत्त्व अस्तित्व, प्राण, प्रकृति का वह गुण जिसका लक्षण प्रकाश है। सदाशिव शिव से गिनने पर तीसरा तत्त्व, वह अवस्था विशेष जिसमें अहं (मैं) का प्राधान्य रहता है ओर इदं (यह विश्व) अस्फुट रहता है। इस तत्त्व का दूसरा नाम है सादाख्यतत्त्व । इस तत्त्व में इच्छा की प्रधानता होती है। समरस समचेतन समाधि चित्त की प्रगाढ एकाग्रता । समान पंचप्राणों में से वह प्राण अथवा वायु जो भोजन इत्यादि का समीकरण करता है और प्राण और अपान वायु का सन्तुलन करता हैं। समापत्ति समाधि की परिपूर्णता । समावेश शिव या शक्ति से आविष्ट होना, वैयक्तिक चेतना का ईश्वरीय चेतना में लय । सहज स्वाभाविक ।

पारिभाषिक शब्दों का कोश १५७ सामरस्य चेतना का एकात्म्य, शिव और शक्ति का तादात्म्य । संकोच सिकुड़न, परिमितता । सांख्य वह दर्शन जो पुरुष और प्रकृति को दो सर्वथा भिन्न मूल तत्त्व मानता है। इस दर्शन का अनुयायी भी सांख्य कहलाता है। सुषुप्ति गाढ़ स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था । सृष्टि सर्जन, निस्सरण, निर्गम, प्रकटीकरण । सर्वकर्तृत्त्व सब कुछ करने की शक्ति । सर्वज्ञत्व सब कुछ जानने की शक्ति । स्थिति धारण, रखाव । स्वप्न सपने की अवस्था । स्वरूप अपना वास्तविक रूप, वास्तविक भाव, मूलवस्तु । स्वरूपापत्ति अपने वास्तविक रूप की प्राप्ति । स्वतन्त्र अपनी इच्छानुसार निरपेक्ष अबाधित कर्ता । स्वातन्त्र्य परमशिव का निरपेक्ष अबाधित इच्छानुसार कर्तृत्व । स्वात्मसात्कृ अपने में मिला लेना, अपने में समीकरण कर लेना । स्वेच्छा शिव या शक्ति की अपनी इच्छा, स्वातंत्र्य । ह ह शक्ति का प्रतीक । हठपाक अनुभव का प्रमातृचेतना के साथ सात्मीकरण की निरन्तर आग्रही प्रक्रिया । हेतु कारण हेतुमत् कार्य हृदय केन्द्रीय चेतना, आध्यात्मिक केन्द्र ।

इस पृष्ठ पर कोई सीधा मुद्रित पाठ नहीं है; यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page) है जिस पर पृष्ठ के दूसरी ओर (reverse side) का पाठ उल्टे/दर्पण रूप (bleed-through/ghost text) में धुंधला दिखाई दे रहा है।

(रिक्त पृष्ठ / Blank Page — दूसरी ओर का पाठ उल्टे रूप में पारदर्शी है)