भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 187 में से

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पारिभाषिक शब्दों का कोश १४७ छ छेव अनच्क की ध्वनि से प्राण और अपान का निरोध ज जगत् गच्छति इति जगत्-जो बराबर चलता रहे, स्थायी न हो। जगदानन्द आत्मा या महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में अभिव्यक्त है। जाग्रत् जागते रहने की अवस्था; वह अवस्था जिसमें जीव शब्द, स्पर्श इत्यादि विषयों का ग्रहण करता रहता है। जीव देहावच्छिन्न चैतन्य, जीवात्मा। जीवन्मुक्ति देहमें रहते हुए, जीते जी हो जानेवाली मुक्ति ज्ञान सच्चा बोध; ईश्वर की शक्ति त तत्त्व वहपन, किसी वस्तु का वस्तुत्व, सार, आद्य अथवा मूलरूप तनुता क्रमशः कम होता जाना, सूक्ष्मता, प्रह्सन, लघूकरण तमस् प्रकृति का स्थित्यात्मक गुण, मोह तर्कशास्त्र ऊहापोह का शास्त्र, युक्तिशास्त्र तांत्रिक तंत्र का अनुयायी त्रिक तीन-(१) शिव, (२) शक्ति, (३) नर, अथवा पर (१), परापर (२), अपर (३) का दर्शन वा शास्त्र तुरीय जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति से परे चेतना की चौथी अवस्था जो तीनों अवस्थाओं को एक सूत्र में बाँधती है, अविकल चेतना मनोवैज्ञानिक प्रमाता से भिन्न दृक् चैतन्य, साक्षिचैतन्य। तुर्य तुरीय तुर्यातीत तुर्य से परे चेतना की अवस्था जिसमें तीन- जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का भेद

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