भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

१४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय कुल शक्ति कुलाम्नाय शाक्त शास्त्र या सिद्धान्त क्रिया कार्य, शुद्धविद्या की शक्ति ख खेचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता से सम्बद्ध शक्ति, वह शक्ति जो खे (आकाश में) चरी (चलने वाली) है—आकाश इस सन्दर्भ में चेतना का प्रतीक है : ख्याति ज्ञान ग गोचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता के अन्तःकरण से सम्बद्ध। 'गो' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय, अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, अतः गोचरी अन्तःकरण से सम्बद्ध है। ग्राहक ज्ञाता, प्रमाता, विकल्पमय जीव ग्राह्य ज्ञेय : विषय । च चमत्कार पूर्णाहन्ता का आनन्द : कलाजन्य आनन्द का अनुभव । चरमकला शान्त्यतीत कला अथवा शान्तातीत कला, अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट अवस्थान । चार्वाक भौतिकवादी; अनात्मवादी, यदृच्छावादी स्वभाववादी। चार्वाक दर्शन भौतिकवादी-अनात्मवादी-यदृच्छावादी दर्शन चित् शुद्ध परम निरूपाधिक चैतन्य सब विकारों का अविकृत अधिष्ठान । चित्त चितिशक्ति के संकोच से जन्य सत्वप्रधान- स्वरूपी चेतना; मायाप्रमाता का स्वरूप । चेतन आत्मा : परमेश्वर, चैतन्यविशिष्ट जीव, प्राणी । चेत्य ज्ञेय, चेतना का विषय ।