प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
१४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय कुल शक्ति कुलाम्नाय शाक्त शास्त्र या सिद्धान्त क्रिया कार्य, शुद्धविद्या की शक्ति ख खेचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता से सम्बद्ध शक्ति, वह शक्ति जो खे (आकाश में) चरी (चलने वाली) है—आकाश इस सन्दर्भ में चेतना का प्रतीक है : ख्याति ज्ञान ग गोचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता के अन्तःकरण से सम्बद्ध। 'गो' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय, अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, अतः गोचरी अन्तःकरण से सम्बद्ध है। ग्राहक ज्ञाता, प्रमाता, विकल्पमय जीव ग्राह्य ज्ञेय : विषय । च चमत्कार पूर्णाहन्ता का आनन्द : कलाजन्य आनन्द का अनुभव । चरमकला शान्त्यतीत कला अथवा शान्तातीत कला, अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट अवस्थान । चार्वाक भौतिकवादी; अनात्मवादी, यदृच्छावादी स्वभाववादी। चार्वाक दर्शन भौतिकवादी-अनात्मवादी-यदृच्छावादी दर्शन चित् शुद्ध परम निरूपाधिक चैतन्य सब विकारों का अविकृत अधिष्ठान । चित्त चितिशक्ति के संकोच से जन्य सत्वप्रधान- स्वरूपी चेतना; मायाप्रमाता का स्वरूप । चेतन आत्मा : परमेश्वर, चैतन्यविशिष्ट जीव, प्राणी । चेत्य ज्ञेय, चेतना का विषय ।
पारिभाषिक शब्दों का कोश १४७ छ छेव अनच्क की ध्वनि से प्राण और अपान का निरोध ज जगत् गच्छति इति जगत्-जो बराबर चलता रहे, स्थायी न हो। जगदानन्द आत्मा या महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में अभिव्यक्त है। जाग्रत् जागते रहने की अवस्था; वह अवस्था जिसमें जीव शब्द, स्पर्श इत्यादि विषयों का ग्रहण करता रहता है। जीव देहावच्छिन्न चैतन्य, जीवात्मा। जीवन्मुक्ति देहमें रहते हुए, जीते जी हो जानेवाली मुक्ति ज्ञान सच्चा बोध; ईश्वर की शक्ति त तत्त्व वहपन, किसी वस्तु का वस्तुत्व, सार, आद्य अथवा मूलरूप तनुता क्रमशः कम होता जाना, सूक्ष्मता, प्रह्सन, लघूकरण तमस् प्रकृति का स्थित्यात्मक गुण, मोह तर्कशास्त्र ऊहापोह का शास्त्र, युक्तिशास्त्र तांत्रिक तंत्र का अनुयायी त्रिक तीन-(१) शिव, (२) शक्ति, (३) नर, अथवा पर (१), परापर (२), अपर (३) का दर्शन वा शास्त्र तुरीय जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति से परे चेतना की चौथी अवस्था जो तीनों अवस्थाओं को एक सूत्र में बाँधती है, अविकल चेतना मनोवैज्ञानिक प्रमाता से भिन्न दृक् चैतन्य, साक्षिचैतन्य। तुर्य तुरीय तुर्यातीत तुर्य से परे चेतना की अवस्था जिसमें तीन- जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का भेद
१४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय समाप्त हो जाता है, वह आनन्दमय शुद्ध चेतना जिसमें कोई विकार नहीं होता, जिसमें विश्व अपना आत्मा ही जान पड़ता है। द दर्शन तत्त्वज्ञान करानेवाला शास्त्र। दिक्चरी दिशाओं में चलनेवाली, वामेश्वरी शक्ति का वह प्रकार जो बहिष्करण अर्थात् बाह्येन्द्रियों से सम्बद्ध है। दिक् का अर्थ है देश या दिशा। बाह्येन्द्रियों का सम्बन्ध देश से है। इसलिए बहिष्करण दिक्चरी शक्ति का क्षेत्र हैं। देश फैलाव, दिक् न नित्यत्व सनातनत्व निभालन देखना, मानसिक अभ्यास निमीलनसमाधि ध्यान की वह आन्तरिक अवस्था जिसमें व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना में समाहित हो जाती है। निमेष पलक मारना, विश्व का परम शिव में लीन हो जाना। नियति कार्य-कारण द्वारा संकोच, देश-संबंधी संकोच। नैयायिक न्यायशास्त्र का विद्वान् या न्याय का अनुसरण करनेवाला। प पंचकृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह ये शिव के पाँच कृत्य अथवा योगी के आभासन, रक्ति, विमर्शन, बीजावस्थापन, विलापन-ये पाँच कृत्य। पति प्रभु, शिव पतिदशा परप्रमातृदशा, शुद्धाध्वप्रमातृता, मुक्ति। पर सर्वोत्कृष्ट परप्रमाता सर्वोत्कृष्ट ज्ञाता, परमशिव
पारिभाषिक शब्दों का कोश १४६ परमशिव परमसत्, परमार्थ, अनुत्तर, विश्वोत्तीर्ण- विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशघन शिव । परमार्थ सर्वोत्कृष्टसत्, तात्विकसत्य, यथार्थतत्व, सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य । परापर पर (परमार्थ, अद्वय) और अपर (भेद) दोनों, सर्वथा अद्वय और सर्वथा भेद दोनों के बीच की अवस्था, भेदाभेद-भेद के भीतर अभेद । परामर्श मानसिक पकड़, अनुभव, बोध, स्मरण करना । पराशक्ति परमशिव की सर्वोत्कृष्टशक्ति, चिति, पार- मेश्वरीस्वातंत्र्यशक्ति । परावाक् परमशिव की चित्-स्पन्द रूपी शक्ति : अव्यक्त शब्द; विश्वचेतना, किसी अन्य की अपेक्षा न करती हुई अहंपरामर्शमयी पराशक्ति, परमा- न्दात्मक स्वातंत्र्यशक्ति । परिच्छन्न परिसीमित । परिणाम विकार, एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त होना, रूपान्तर होना । पशु अविद्या इत्यादि पाश में बँधा हुआ जीव, अज्ञानी । पश्यन्ती परमशिव का होनेवाले विश्व का अविशिष्ट रूप में ईक्षण, वाक्शक्ति की सर्जन की उन्मुखता जिस अवस्था में वाच्य (अर्थ) और वाचक (पद) अभिन्न रहते हैं । पांचरात्र वैष्णवदर्शन, इस दर्शन का अनुयायी पांचरात्रिक वैष्णव दर्शन वा मार्ग का अनुयायी पाश बन्धन, रस्सी पुर्यष्टक पंचतन्मात्रा, बुद्धि, अहंकार और मन—इन आठों की पुरी वा समूह, सूक्ष्मशरीर । पूर्णत्व सर्वोत्तम अवस्था । पूर्णाहन्ता पूर्ण अहंचेतना जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय का कोई भेद नहीं रहता । पृथिवी पंचमहाभूतों में ठोस तत्त्व । प्रकाश आत्माभिव्यक्ति-तत्त्व, चैतन्य जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है ।
१५० प्रत्यभिज्ञाहृदय प्रकृति बुद्धि से लेकर पृथिवी तक की अभिव्यक्ति का उत्स वा प्रभव। प्रत्यभिज्ञा पहचान, यह ज्ञान कि परमेश्वर और जीवात्मा एक है। प्रत्याहार सूत्र के प्रथम वर्ण (अक्षर) और अन्तिम निर्देशनात्मक वर्ण (अक्षर) के संयोग से बना हुआ एक शब्द जो कि कई वर्णों का सूचक होता है। (दे० टि० १७५)। योग की वह क्रिया जिसमें इन्द्रियों को विषयों से हटाकर निरुद्ध किया जाता है। प्रथ विस्तृत होना, विकसित होना, प्रदर्शित होना प्रथा बढ़ने, फैलने, विकसित होने, प्रदर्शित होने का ढंग, रीति, परिपाटी। प्रमाण प्रमा (सच्चे ज्ञान) का करण या साधन; सबूत। प्रमाता ज्ञाता, प्रमाण द्वारा किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला, अनुभव करनेवाला। प्रमेय प्रमा या ज्ञान का विषय। प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली मायातत्व में अवस्थित शून्य का प्रमाता। प्रसर फैलाव, शिव का अपनी शक्ति द्वारा विश्वरूप में अभिव्यक्ति। प्राण जीवन शक्ति, प्रश्वासवायु। प्राणायाम श्वास-प्रश्वासगति का नियमन। ब बन्ध बन्धन, योग की वह क्रिया जिसमें शरीर के कुछ भाग संकुचित करके एक विशेष स्थिति में परिबद्ध कर लिये जाते हैं। बल इस दर्शन में बल का अर्थ है 'चिद्बल'-चित् अथवा आत्मा की शक्ति। बहिर्मुखता चेतना की बाहर की ओर उन्मुखता, पराक्चेतना। बहिर्मुखी भाव बहिर्मुखता की अवस्था या दशा।
पारिभाषिक शब्दों का कोश १५१ बिन्दु (विन्दु) बूंद, नुक्ता, आतिभौतिक बूंद अर्थात् घनी- भूता शक्ति जो कि एक अविशिष्ट विन्दु में संहृत होकर सर्जन के लिए उन्मुख है, पर प्रमाता, अनुस्वार जो कि अहं के ऊपर बिन्दु रूप में रखा हुआ (अहं) यह संकेत करता है कि शिव 'अ' से लेकर 'ह' तक जगत् में विभिन्न रूप से अभिव्यक्त होने पर भी अभिन्न है (दे० टि० १७६) । बीजावस्थापन बीज का रखना, गूढ़ार्थ-विलय अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को संगोपित या छिपा रखना । बुद्धि व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका चेतना, चेतना की वह स्थिति जिसमें जीव अंधकार से जग जाता है । बैन्दवी कला बैन्दवी-बिन्दु सम्बन्धी-इस प्रसंग में बिन्दु का अर्थ है परप्रमाता; कला-कौशल, स्वातंत्र्य । बैन्दवीकला परमशिव का वह कौशल, वह स्वातंत्र्य जिससे प्रमाता सदा प्रमाता बना रहता है और कभी प्रमेय में अन्तर्भूत नहीं होता । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना, मध्यप्राण नाडी ब्रह्मारन्ध्र सहस्रार चक्र ब्रह्मवाद (इस दर्शन में) शांकरवेदान्त । भ भाव बाह्य अथवा आन्तरिक सत्ता, विषय । भुवन होना, होने का स्थान, लोक, आलय । भूचरी वामेश्वरी शक्ति का एक प्रकार जो कि भावों से सम्बद्ध है । भूमिका अभिनेय अंश, गृहीतकार्य । भैरव परमशिव । यह भ, र, और व की अक्षरमुष्टि है । भ 'भरण' (स्थिति) का द्योतक है, र 'रवण' (संहार) का द्योतक है और व 'वमन' (सृष्टि) का द्योतक है । भोग सुख-दुःख का अनुभव-कभी कभी सुखमात्र के संकुचित अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त होता है ।
१५२ प्रत्यभिज्ञाहृदय भोक्ता सुखदुःख का अनुभव करनेवाला । म मध्य संवित्, शुद्ध अहन्ता, सुषुम्ना अर्थात् मध्यनाड़ी मध्यधाम सुषुम्ना, ब्रह्मनाड़ी मध्यमा स्थूल अभिव्यक्ति के पूर्व बुद्धिनिष्ठ वाक्शक्ति। मध्यशक्ति संवित् शक्ति मन्त्र वह प्रमाता जिसने शुद्ध विद्या का साक्षात्कार कर लिया है; विद्यातत्त्व में अध्यासीन प्रमाता; वह शब्द या शब्दसमूह जिसका जप या ध्यान किया जाय । मन्त्रमहेश्वर वह प्रमाता जिसने सदाशिवतत्त्व का साक्षा- त्कार कर लिया है । मन्त्रेश्वर वह प्रमाता जिसने ईश्वरतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है । महामन्त्र शुद्ध चेतना का, पूर्णाहन्ता का मन्त्र । महार्थ परमोत्कृष्ट लक्ष्य, शुद्धपूर्णाहन्तापद, कौल- साधना । महेश्वर परमेश्वर, परमशिव, अनुत्तर माध्यमिक बौद्ध मध्यमकदर्शन का अनुयायी । माया 'मा' धातु से निष्पन्न 'मापना' । अनन्त की मेय और परिच्छिन्न बनाने की, आवरण और विक्षेप की शक्ति, शुद्धविद्या से नीचे का तत्त्व, पाँच कञ्चुकों की योनि । मायाप्रमाता माया द्वारा वशीभूत जीव । मायीयमल माया के द्वारा मल या संकोच जिससे जीव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर बनते हैं और भेद की प्रतीति होती है । माहैश्वर्य महेश्वर की शक्ति । मीमांसक मीमांसा दर्शन का अनुयायी । मुक्ति आत्मतत्त्व का परिज्ञान, अज्ञानग्रंथि के भेद से स्वात्मशक्ति की अभिव्यक्ति, परमशिवी भाव । मुद्रा आध्यात्मिक आनन्द (मुद) को देनेवाली (रा) स्थिति, तुर्यचेतना में विश्व को मुहरबन्द
पारिभाषिक शब्दों का कोश १५३ करनेवाली दशा (मुद्रयति इति), हाथ, गर्दन इत्यादि की विशेषभावसूचक स्थिति, योग में ध्यान के सहायक रूप में कुछ अवयवों का नियन्त्रण । मुद्राक्रम (अथवा क्रममुद्रा) तुरीया चितिशक्ति, वह अवस्था-विशेष जो सृष्टि-स्थिति-संहृति रूपी चक्र के क्रम को मुद्रित करता है अर्थात् आत्मसात् करता है, वह अवस्था विशेष जिसमें चित्त में समावेश के वेग से आभ्यन्तर और बाह्य में आत्मा और विश्व में क्रम से एकरूपता अर्थात् शिवात्मकता की संसिद्धि होती है । मेय भौतिक ज्ञेय, विषय, भौतिक पदार्थ । मोक्ष दे० मुक्ति र रक्ति आस्वाद, आनन्द, गूढ़ार्थ-स्थिति । रजस् प्रकृति का प्रवृत्तिरूपीगुण । राग माया का एक कंचुक जिसके द्वारा पूर्णत्व परिछिन्न हो जाता है और विषय-विशेष के लिए अभिलाषा उत्पन्न होती है । व वह्नि (वहू-ले जाना) शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द जिसका अर्थ है अःधकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्ध भाग में पूर्ण रूप से प्रवेश करना दे० टि० १५७ । वाचक शब्द, संकेत । वाच्य जिसका अभिधाशक्ति से बोध हो, पदार्थ । वामेश्वरी परमशिव की वह शक्ति जो कि विश्व का वमन करती है, अर्थात् परमशिव से विश्व को बाहर प्रक्षिप्त करती है और इस प्रकार वाम चेतना अर्थात् अभेद में भेद उत्पन्न करती है । वाह सुषुम्ना की बाईं ओर ईडा नाड़ी में बहते हुए प्राणवायु और दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी में बहते हुए अपान वायु की समुच्चयात्मक संज्ञा वाह है ।
१५४ प्रत्यभिज्ञाहृदय विकल्प विभिन्नता, भेदयुक्त ज्ञान, प्रत्ययन, कल्पना । विकल्पनम् चित् की भेद-ज्ञान की क्रिया । विकल्पक्षय विकल्पों का विलोप । विकास खिलना, प्रसार । विग्रह शरीर, रूप, आकार । विग्रही शरीरी, शरीरयुक्त । विद्या परिच्छिन्न ज्ञान । विभूति वैभव, महत्ता, अलौकिक शक्ति । विमर्श शब्दार्थ-अनुभव, ज्ञान इस शास्त्र में पारि- भाषिक अर्थ-परम शिव की ज्ञान क्रियात्मक आत्मसं वित्ति-रूपी-शक्ति जिससे सृष्टि होती है विमर्शन आन्तर्बोध, गूढ़ार्थ-संहार । विलय संगोपन, तिरोभाव । विलापन संहार, (गूढ़ार्थ) अनुग्रह । विश्व समग्र ब्रह्माण्ड, समग्र । विश्वमय विश्वात्मक समग्र ब्रह्माण्ड में अन्तर्व्याप्त, सर्वव्यापी, अन्त- र्वर्ती, विश्वानुग । विश्वोत्तीर्ण परात्पर, भौतिक संसृति से परे, अतिवर्ती विश्वातिग । विष यह शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द है । अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश 'विष' कहलाता है। विज्ञानाकल वह व्यक्ति जो माया से तो ऊपर है, किन्तु शुद्धविद्या से नीचे है, जिसमें ज्ञान है किन्तु कर्तृत्व नहीं है । वह कार्म और मायीय मल से मुक्त होता है किन्तु अभी आणव मल से मुक्त नहीं है । वैखरी शक्ति जो स्थूल, भौतिक अक्षर में व्यक्त है । वैष्णव विष्णु का अनुयायीः वैष्णवदर्शन और प्रक्रिया का अनुयायी । व्यान वह वायु या प्राण जो चारों ओर व्याप्त है । व्यापकत्व सर्वव्यापिता । व्यामोहितता मोह ।
पारिभाषिक शब्दों का कोश १५५ व्युत्थान शाब्दिक अर्थ उठना, योग का पारिभाषिक शब्द-'समाधि के बाद सामान्य चेतनावस्था में आ जाना।' श शक्ति शिव का अन्तर्बल जिसके द्वारा वह पंचकृत्य करता है। शक्तिपात किसी शिष्य या साधक पर शक्ति का गिराव, अनुग्रह। शक्तिप्रसर शक्तिविकास, समाधि से साधारण दशा में आने पर भी समाधि के अनुभव को बनाये रखना। शक्तिविकास इन्द्रियों के विषयों की ओर खुले रखने पर भी आन्तरिक सत्य पर एकाग्रता को बनाये रखना। शक्तिविश्रान्ति समाधि में निमज्जित होना और उस दशा में टिके रहना। शक्तिसंकोच इन्द्रिय व्यापार से चित्त को हटाकर आन्तरिक सत्य की ओर मोड़ना। शब्दब्रह्म चरमसत् जिसका स्वरूप स्पन्दन है जिसमें पद और अर्थ एक हैं और जिसका मानवीय शब्द स्थूल प्रतिरूप है (दे० टि० ७२-७१)। शासन शास्त्र शिव सत्, परमार्थ, भद्र शिवतत्त्व ३६ तत्त्वों में का आदितत्त्व जिसका लक्षण है चित् स्वरूप। शुद्धविद्या शिव से गिनने पर पाँचवा तत्त्व जिसका परा- मर्श है 'इदं च अहं च'। दे० टि० १८ में ३६ तत्त्व। शुद्धाध्व अतिजागतिक सत्ता, प्रथम पाँच तत्त्वों की अभिव्यक्ति। शून्य रिक्त, वह अवस्था जिसमें किसी पदार्थ का अनुभव नहीं होता। शून्यप्रमाता केवल शून्य अर्थात् रिक्त का अनुभव करने वाला, प्रलयांकल।
१५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ष षष्ठवक्त्र छठवाँ अवयव, गुदा के मूल के पास का मेद्रकंद स संवित् चेतना, परम चेतना । संवित् देवता समष्टि की दृष्टि से-खेचरी, गोचरी, दिक्- चरी और भूचरी संवित् देवता है, व्यष्टि की दृष्टि से आन्तरिक और बाह्य इन्द्रियाँ संवित् देवता हैं। संसार जगत्, जन्म-मरण । संसारी जीव जिसका संसरण ( जन्म-मरण ) होता रहता है। संसृति गमनागमन, जन्म-मरण का क्रम। संहार बटोर लेना, जगत् का शिव में लय । सकल देव से लेकर कीट तक सभी जीव जो माया- तत्त्व में हैं। इन्हें अपने आत्मा का बोध नहीं होता और इनमें भेद-बुद्धि बनी रहती है। सत् अस्तित्व जिसका स्वरूप चित् है। सत्त्व अस्तित्व, प्राण, प्रकृति का वह गुण जिसका लक्षण प्रकाश है। सदाशिव शिव से गिनने पर तीसरा तत्त्व, वह अवस्था विशेष जिसमें अहं (मैं) का प्राधान्य रहता है ओर इदं (यह विश्व) अस्फुट रहता है। इस तत्त्व का दूसरा नाम है सादाख्यतत्त्व । इस तत्त्व में इच्छा की प्रधानता होती है। समरस समचेतन समाधि चित्त की प्रगाढ एकाग्रता । समान पंचप्राणों में से वह प्राण अथवा वायु जो भोजन इत्यादि का समीकरण करता है और प्राण और अपान वायु का सन्तुलन करता हैं। समापत्ति समाधि की परिपूर्णता । समावेश शिव या शक्ति से आविष्ट होना, वैयक्तिक चेतना का ईश्वरीय चेतना में लय । सहज स्वाभाविक ।
पारिभाषिक शब्दों का कोश १५७ सामरस्य चेतना का एकात्म्य, शिव और शक्ति का तादात्म्य । संकोच सिकुड़न, परिमितता । सांख्य वह दर्शन जो पुरुष और प्रकृति को दो सर्वथा भिन्न मूल तत्त्व मानता है। इस दर्शन का अनुयायी भी सांख्य कहलाता है। सुषुप्ति गाढ़ स्वप्नरहित निद्रा की अवस्था । सृष्टि सर्जन, निस्सरण, निर्गम, प्रकटीकरण । सर्वकर्तृत्त्व सब कुछ करने की शक्ति । सर्वज्ञत्व सब कुछ जानने की शक्ति । स्थिति धारण, रखाव । स्वप्न सपने की अवस्था । स्वरूप अपना वास्तविक रूप, वास्तविक भाव, मूलवस्तु । स्वरूपापत्ति अपने वास्तविक रूप की प्राप्ति । स्वतन्त्र अपनी इच्छानुसार निरपेक्ष अबाधित कर्ता । स्वातन्त्र्य परमशिव का निरपेक्ष अबाधित इच्छानुसार कर्तृत्व । स्वात्मसात्कृ अपने में मिला लेना, अपने में समीकरण कर लेना । स्वेच्छा शिव या शक्ति की अपनी इच्छा, स्वातंत्र्य । ह ह शक्ति का प्रतीक । हठपाक अनुभव का प्रमातृचेतना के साथ सात्मीकरण की निरन्तर आग्रही प्रक्रिया । हेतु कारण हेतुमत् कार्य हृदय केन्द्रीय चेतना, आध्यात्मिक केन्द्र ।
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अकारादिक्रम से मुख्य शब्दों की अनुक्रमणिका अ अनुप्रवेशक्रम ८८ अकार १५ अनुभयात्मा ६४ अकृतक १५ अनुभाव ८५ अक्रम ६४, ८६, ९७ अनुरूप ४९ अकिञ्चिच्चिन्तकतवेन ८४ अपरिच्छिन्न ४६ अकुल १५ अपरिज्ञान ७०-७६ अख्याति ५१, ५३, ५९ अपवर्ग ६० अज्ञान ७१, ७४ अप्रकाशमानत्वेन ४४ अधः कुण्डलिनी ८७ अप्रतिहतस्वातन्त्र्यरूपा ६५ अधोवक्त्र ८३ अपान ७५ अध्यवसाय ९७ अपूर्णमन्यता ६६ अध्यारोह ७६, ७७ अभावब्रह्मवादी ६१ अन्तकोटि ८९ अभिज्ञान ६६ अन्तः ७४ अभिधार्थं ४६ अन्तरात्मन् ८६ अभिमान ७३ अन्तःकरण ६६, ७३, ९८ अभ्यास ८१ अन्तर्निगूढ ८६ अभेद ५९, ७३ अन्तर्मुखता ९१ अभेदे ४५, ७२ अन्तर्मुखी ७६ अभेदेन ५० अन्तर्मुखीभाव ७७ अभेदालोचन ७४ अन्तःस्वरूपया ९१ अभेदनिश्चय ७४ अन्तर्लक्ष्य ८३ अभेदविषय ७२ अनन्त ९७ अभेदव्याप्ति ६५ अनन्तभट्टारक ५० अमृतत्व ८६ अनाश्रित ५१, ५५ अमृतस्यन्दिनी ८५ अनुग्रह ६७ अमायीय ९८ अनुग्रहीतृता ६८ अमोक्षे ६३ अनुत्तर १५ अर्थावभास ७१
( २ ) अर्थावरोह ६५ आभास ६८ अलंघास ७० आभासन ६९ अवरोहक्रम ८२ आभाति ६९ अवरोहपद ७७, ७८ आभ्यन्तर ९२ अव्यक्त ६१, ६२ आमर्श ९२ अवस्थानम् ४९ आलोचन ७३ अवस्थितस्य ४८ आवेश ४६ अवास्तवता ४७ आवेशवश ९१ अविकल्प ७१, ७२, ८४ आवृत्तचक्षु ८६ अशेषशक्तित्वम् ४८ आर्हत ६२ असत् १ इ अस्फुट ७१ इच्छा ५९ असमसुख ८५ इच्छाशक्ति ६५ असम सौख्य ९० इदन्ता ५० असंकुचित ६५ ई असाधारण ७१ ईश ५५ अहन्ता ९६ ईश्वराद्वय ६७ अहंप्रतीति ६० ईश्वरतत्त्व ४९, ६१ अहंभाव ९५ ईश्वरता =४, ९४, ९५, ९८ आ ईश्वरप्रत्यभिज्ञा ४४, ९९ आगम ६१ ईश्वरभट्टारक ५० आच्छादन ७९ उ आणव ५८, ६६ उपनिषत् ४३ आत्मतत्त्व ६१, ६२ उपपन्न ४६ आत्मा ५७, ५८, ६० उपयुक्त ४६ आत्मसात् ७९, ८० उपादान ४८ आत्मोपासक ६३ उपाय ४४ आत्मविश्रान्ति ९५ उपारोह ४६ आदिकोटि ८९ उभयरूपा ६४ आद्यन्तकोटिनिभालन ८३ उल्लास ९० आदिक्षान्त ७१, ९४ ऊ आनन्द ५९, ६० ऊर्ध्वकुण्डलिनी ८७
( ३ ) ऐ ऐश्वर्यशक्ति ७४ क कञ्चुक ५९ कठवल्ली ८५ कठिनत्वेन ५२ कर्तृत्व ५५ कर्तृतात्मा ७४ कर्तृताशून्य ५० कर्मेन्द्रिय ६६ करणेश्वरी ७९ कला ४६, ५९, ६६, ७३, ९४ क्रममुद्रा ९१, ९२ कारणत्व ४४ कार्यकारणभाव ४५ कामं ५८ काल ४५, ४७, ५८, ५९, ६६, ६७ कालाग्नि ९४ किञ्चित्कर्तृत्व ६६, ७३ किञ्चिज्ज्ञत्व ६६ कृत्रिम ६० कृशा ६४ क्रिया ५६, ५९ क्रियाशक्ति ६६ क्रीडा ८२ ख खानि ८६ ख्याति ५३ खेचरी ७३ खेचरीचक्र ७३
ग ग्राहक ४७, ४९, ५१, ५२, ५३, ५४, ५८, ७१, ७७ ग्राह्य ४७, ४९, ५०, ५१ गृहीतप्राणादिसंकोच ५८ गृहीतसंकोच ७५ गोचरी ७३ गोचरीचक्र ७३ च चक्रवर्ती ९८ चक्रेश्वर ९८ चतुरात्मा ५८ चमत्कार ६९ चार्वाक ६० चित् ४५, ४९ चितः ४५, ४८, ५६, ७९ चितिः ४४, ४५, ४६, ५१, ५४, ७६, ७७, ७८, ८० चित्त्व ४८ चित्प्रकाश ४५, ७५ चित्प्राधान्य ५४ चित्प्राधानत्वे ५५ चित्तम् ५४, ५६, ५७, ७६ चित्तमय ५६ चित्तसंस्कारवती ५७ चितिचक्र ९८ चितिवह्नि ७७ चितिशक्ति ७३, ९२, ९७ चितिशक्तिमयीप्रथा ९६ चिदग्नि ६९ चिद्रूप ९७
( ४ ) चिद्वत् ६७, ७५ त चिदात्मन् ६७, ७४ तत्त्व ५४ चिदात्मा ५८, ६५ तदग्र ८७ चिदानन्द ७२, ८१, ८२, ९० तदात्मा ९० चिदानन्दघन ४३, ६३, ७५ तन्मध्य ८७ चिदैक्य ९१ तन्मयत्व ९० चिदैकात्म्य ८१ तन्मयीकरण ९६ चिन्ता ५३ तन्मूल ८७ चिन्मय ५३ तमस् ५५, ५६ चेतन ५१, ५४, ७६ तांत्रिक ६२ चेत्य ५४, ५५ तीक्ष्णतर्कशास्त्र ४४ चेत्यमान ८१ तीक्ष्णयुक्ति ९९ चैतन्यम् ५७ तुरीया १२ चैतन्यविशिष्ट ६० तुर्य ७५, ८८ तुर्यातीत ७५, ८४ छ त्रिकादिदर्शन ६२ छन्न ७५, ७७, ७८ त्रिमय ५८ छाया ४६ त्रिशिरोभैरव ५२ छेद ८८ द ज दर्पण ४८ जगत् ४५ दर्शन ६०, ६३ जगतः ४९ द्वादशान्त ८९ जगदात्मना ४५ दिक्चरी ७३ जगदानन्द ९५ दिक्चरीचक्र ७३ जाग्रत् ७५ द्विरूप ५८ जीव ५४, ६१ दुःख ६० जीवन्मुक्त ६८, ८२ देव ६७ जीवन्मुक्ति ७५, ८१ देश ४५, ४७, ५८, ६७ ज्ञान ५६, ५९, ६०, ९७ देह ४७, ६७, ७२, ७५, ७६, ७९, ज्ञानसन्तान ६० ८१, ८२, ९६ ज्ञानशक्ति ६६ दृगादिदेवी ६९
( ५ ) द्वार ८६ पराङ् ८६ न परानन्द ९० नष्ट ६९ पराञ्चि ८६ नाना ४९ परादशा ८५ नाडीसहस्र ८३ पराद्वय ४६ नासापुट ८७ पराप्रकृति ६१ नित्यत्व ६६ पराभूमि ७७ नित्योदित ४५, ७१, ९०, ९१, ९२, ९३ परामृष्ट ६९ निमज्जन ७९, ८०, ८१, ९६ परावाक्शक्ति ७१ निमज्ज्य ६५ पराशक्ति ४४ निमिषति ४४ पशु ५५, ५६ निमीलन ९७ पशुदशा ७५ निमीलितसमाधिक्रम ९१ पशुभूमिका ७३ निमेष ८६ पशुहृदयम् ७४ नियति ५९, ६६ पश्यन्ती ६१, ७१ निश्चय ७३ पञ्चत्रिंशत् ५९ निलीनाक्ष ८९ पञ्चकस्वरूप ५९ निहितचित्त ८४ पञ्चविधकृत्य ६७, ६८, ६९, ७०, २४ नील ४७, ५५, ६३, ६७, ७८, ८१, ९६ पञ्चकृत्य ४३ नैयायिक ६० पञ्चकृत्यकारित्व ७६ परिणाम ६१ प परिज्ञान ४७, ५४, ७४, ७६ परप्रमातृ ४४ परिपूर्णता ४५ परमयोगी ९०, ९४, ९८ परिमितानाम् ५० परमशिव ५१ पद्मसंपुट ८९ परमानन्द ५१ पतिदशा ७२ परमार्थ ४३, ४५, ५६ पतिदशात्मा ७५ परस्याः प्रकृतेः ६१ पतिभूमिका ७४ परशक्तिपात ६२ पादोद्देश ४६ परमेशता ८८ पाञ्चरात्र ६१ पाञ्चरात्रिक ६२ परमेश्वर ४१, ६५, ७४, ७५, ७६ पारतन्त्र्य ८५
( ६ ) पारमार्थिक ७३ प्रमातृ ४५, ४७, ४९, ५०, ७३, ९७ पारमेश्वर ४४ प्रमातृता ५५, ८१ पीत ७८ प्रमातृसत्तक ५९ पृथिवी ५२, ५९ प्रमातृव्याप्ति ६२ पुंसि ६२ प्रमाण ४५, ४६, ४७ पुर्यष्टक ५८, ७५, ९८ प्रमेय ४५, ७६, ७८, ८० पूर्णत्व ६६ प्रलय ९४ पूर्णता ७० प्रलयकेवली ५० पूर्णाऽहम् ७१ प्रलयाकल ५० पूर्णाऽहन्ता ९३, ९४, ९६ प्रसर ७९, ८८, ८९ पूर्णा ६४, ६५, ७४ प्रसरणक्रम ७३ पूर्णानन्द ९९ प्राण ४७, ५८, ६०, ७२, ७५, ७९, प्रकृत्यादि ४५ ८१, ८२, ९६, ९९ प्रकाश ४५, ५०, ९५ प्राणशक्ति ८३ प्रकाशन ४६ प्राणायाम ८४ प्रकाशैकघन ५१ प्रकाशैकात्म्यात् ४५ ब बृद्धात्मानः ६८ प्रकाशैकात्म्येन ४९ बन्ध ७४, ८४ प्रकाशैक्य ६८ बललाभ ७९, ८० प्रकाशानन्दसार ९३ बहिर्दृष्टि ८६ प्रकाशाभेदेन ५१ बहि ९७ प्रकाशमानतया ५१ बहिर्मुख ९१, ९२ प्रच्छादन ६२ बहिर्मुखता ७७ प्रतिभा ९७ बहिर्मुखीभाव ६७ प्रत्यगात्मा ८६ बहिष्करण ७३, ७४, ९८ प्रत्यभिज्ञा ४३, ८५ बाह्यस्वरूपप्रवेशः ९१ प्रत्यभिज्ञाकारिका ६७ बीजावस्थापन ६९ प्रत्यभिज्ञाटीका ६५ बुद्धि ८२ प्रत्याहार ९५ बुद्धितत्व ६०, ६२ प्रथमानतासार ८१ बुद्धीन्द्रिय ६६ प्रभु ६७ बुद्धौ ६०
( ७ ) बौद्ध ६२ म ब्रह्मनाडो ८३ मध्य ८२ ब्रह्मरन्ध्र ८३ मध्यविकास ८२, ९० ब्रह्मवाद ४७ मध्यमा ७१ ब्रह्मवादी ६६ मध्यधाम ७५ ब्राह्मी ७२ मध्यनाडी ८३ मनुष्य ७१ भ मनीरुढ़ ९० भक्तिभाजः ४४ मन्त्र ५०, ७१, ९५ भगवती ४४, ४५ मन्त्रमहेश्वर ४९ भगवतः ६७ मन्त्रवोर्यं ९६ भगवान् ६७ मन्त्रेश्वर ५० भाव ५०, ५५, ७४ मल ५८, ६६ भावस्वभाव ७३ मलावृत ६५ भावराशि ९१ महाफल ४८ भिन्नम् ४५ महानन्दमय ९० भिन्नवेद्यप्रथा ६६ महामन्त्र ७१ भूचरी ७३ महामन्त्रवीर्यात्मक ९३, ९६ भूचरीचक्र ७३ महार्थदृष्टि ६९ भूमिका ५९, ६२, ६३ महाव्याप्ति ६२ भेद ६४, ६६, ७२, ७३ महाह्रद ९६ भेदनिश्चय ७३ महेशता ७२ भेदभूधर ६९ महेश्वर ६७, ९४, ९७, ९९ भेदवाद ४८ मातृ ७४ भेदव्याप्ति ६५ मात्रया ७७, ७८ भेदविषय ७२ माया ४५, ५०, ५५, ५६, ६३ भैरवमुद्रा ७२ मायादशा ८२ भैरवीमुद्रा ८६ मायापद ७७ भैरवात्मता ९० मायाप्रमाता ५६, ७१ भोक्तृता ९८ मायाप्रमातृता ७८ भोग ४७ मायाशक्ति ५३, ९७ भ्रूभेदन ८७ मायोय ५८, ६६