प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारिभाषिक शब्दों का कोश १४६ परमशिव परमसत्, परमार्थ, अनुत्तर, विश्वोत्तीर्ण- विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशघन शिव । परमार्थ सर्वोत्कृष्टसत्, तात्विकसत्य, यथार्थतत्व, सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य । परापर पर (परमार्थ, अद्वय) और अपर (भेद) दोनों, सर्वथा अद्वय और सर्वथा भेद दोनों के बीच की अवस्था, भेदाभेद-भेद के भीतर अभेद । परामर्श मानसिक पकड़, अनुभव, बोध, स्मरण करना । पराशक्ति परमशिव की सर्वोत्कृष्टशक्ति, चिति, पार- मेश्वरीस्वातंत्र्यशक्ति । परावाक् परमशिव की चित्-स्पन्द रूपी शक्ति : अव्यक्त शब्द; विश्वचेतना, किसी अन्य की अपेक्षा न करती हुई अहंपरामर्शमयी पराशक्ति, परमा- न्दात्मक स्वातंत्र्यशक्ति । परिच्छन्न परिसीमित । परिणाम विकार, एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त होना, रूपान्तर होना । पशु अविद्या इत्यादि पाश में बँधा हुआ जीव, अज्ञानी । पश्यन्ती परमशिव का होनेवाले विश्व का अविशिष्ट रूप में ईक्षण, वाक्शक्ति की सर्जन की उन्मुखता जिस अवस्था में वाच्य (अर्थ) और वाचक (पद) अभिन्न रहते हैं । पांचरात्र वैष्णवदर्शन, इस दर्शन का अनुयायी पांचरात्रिक वैष्णव दर्शन वा मार्ग का अनुयायी पाश बन्धन, रस्सी पुर्यष्टक पंचतन्मात्रा, बुद्धि, अहंकार और मन—इन आठों की पुरी वा समूह, सूक्ष्मशरीर । पूर्णत्व सर्वोत्तम अवस्था । पूर्णाहन्ता पूर्ण अहंचेतना जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय का कोई भेद नहीं रहता । पृथिवी पंचमहाभूतों में ठोस तत्त्व । प्रकाश आत्माभिव्यक्ति-तत्त्व, चैतन्य जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है ।