भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय समाप्त हो जाता है, वह आनन्दमय शुद्ध चेतना जिसमें कोई विकार नहीं होता, जिसमें विश्व अपना आत्मा ही जान पड़ता है। द दर्शन तत्त्वज्ञान करानेवाला शास्त्र। दिक्‌चरी दिशाओं में चलनेवाली, वामेश्वरी शक्ति का वह प्रकार जो बहिष्करण अर्थात् बाह्येन्द्रियों से सम्बद्ध है। दिक् का अर्थ है देश या दिशा। बाह्येन्द्रियों का सम्बन्ध देश से है। इसलिए बहिष्करण दिक्‌चरी शक्ति का क्षेत्र हैं। देश फैलाव, दिक् न नित्यत्व सनातनत्व निभालन देखना, मानसिक अभ्यास निमीलनसमाधि ध्यान की वह आन्तरिक अवस्था जिसमें व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना में समाहित हो जाती है। निमेष पलक मारना, विश्व का परम शिव में लीन हो जाना। नियति कार्य-कारण द्वारा संकोच, देश-संबंधी संकोच। नैयायिक न्यायशास्त्र का विद्वान् या न्याय का अनुसरण करनेवाला। प पंचकृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह ये शिव के पाँच कृत्य अथवा योगी के आभासन, रक्ति, विमर्शन, बीजावस्थापन, विलापन-ये पाँच कृत्य। पति प्रभु, शिव पतिदशा परप्रमातृदशा, शुद्धाध्वप्रमातृता, मुक्ति। पर सर्वोत्कृष्ट परप्रमाता सर्वोत्कृष्ट ज्ञाता, परमशिव