प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५० प्रत्यभिज्ञाहृदय प्रकृति बुद्धि से लेकर पृथिवी तक की अभिव्यक्ति का उत्स वा प्रभव। प्रत्यभिज्ञा पहचान, यह ज्ञान कि परमेश्वर और जीवात्मा एक है। प्रत्याहार सूत्र के प्रथम वर्ण (अक्षर) और अन्तिम निर्देशनात्मक वर्ण (अक्षर) के संयोग से बना हुआ एक शब्द जो कि कई वर्णों का सूचक होता है। (दे० टि० १७५)। योग की वह क्रिया जिसमें इन्द्रियों को विषयों से हटाकर निरुद्ध किया जाता है। प्रथ विस्तृत होना, विकसित होना, प्रदर्शित होना प्रथा बढ़ने, फैलने, विकसित होने, प्रदर्शित होने का ढंग, रीति, परिपाटी। प्रमाण प्रमा (सच्चे ज्ञान) का करण या साधन; सबूत। प्रमाता ज्ञाता, प्रमाण द्वारा किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला, अनुभव करनेवाला। प्रमेय प्रमा या ज्ञान का विषय। प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली मायातत्व में अवस्थित शून्य का प्रमाता। प्रसर फैलाव, शिव का अपनी शक्ति द्वारा विश्वरूप में अभिव्यक्ति। प्राण जीवन शक्ति, प्रश्वासवायु। प्राणायाम श्वास-प्रश्वासगति का नियमन। ब बन्ध बन्धन, योग की वह क्रिया जिसमें शरीर के कुछ भाग संकुचित करके एक विशेष स्थिति में परिबद्ध कर लिये जाते हैं। बल इस दर्शन में बल का अर्थ है 'चिद्बल'-चित् अथवा आत्मा की शक्ति। बहिर्मुखता चेतना की बाहर की ओर उन्मुखता, पराक्चेतना। बहिर्मुखी भाव बहिर्मुखता की अवस्था या दशा।