प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारिभाषिक शब्दों का कोश १५१ बिन्दु (विन्दु) बूंद, नुक्ता, आतिभौतिक बूंद अर्थात् घनी- भूता शक्ति जो कि एक अविशिष्ट विन्दु में संहृत होकर सर्जन के लिए उन्मुख है, पर प्रमाता, अनुस्वार जो कि अहं के ऊपर बिन्दु रूप में रखा हुआ (अहं) यह संकेत करता है कि शिव 'अ' से लेकर 'ह' तक जगत् में विभिन्न रूप से अभिव्यक्त होने पर भी अभिन्न है (दे० टि० १७६) । बीजावस्थापन बीज का रखना, गूढ़ार्थ-विलय अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को संगोपित या छिपा रखना । बुद्धि व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका चेतना, चेतना की वह स्थिति जिसमें जीव अंधकार से जग जाता है । बैन्दवी कला बैन्दवी-बिन्दु सम्बन्धी-इस प्रसंग में बिन्दु का अर्थ है परप्रमाता; कला-कौशल, स्वातंत्र्य । बैन्दवीकला परमशिव का वह कौशल, वह स्वातंत्र्य जिससे प्रमाता सदा प्रमाता बना रहता है और कभी प्रमेय में अन्तर्भूत नहीं होता । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना, मध्यप्राण नाडी ब्रह्मारन्ध्र सहस्रार चक्र ब्रह्मवाद (इस दर्शन में) शांकरवेदान्त । भ भाव बाह्य अथवा आन्तरिक सत्ता, विषय । भुवन होना, होने का स्थान, लोक, आलय । भूचरी वामेश्वरी शक्ति का एक प्रकार जो कि भावों से सम्बद्ध है । भूमिका अभिनेय अंश, गृहीतकार्य । भैरव परमशिव । यह भ, र, और व की अक्षरमुष्टि है । भ 'भरण' (स्थिति) का द्योतक है, र 'रवण' (संहार) का द्योतक है और व 'वमन' (सृष्टि) का द्योतक है । भोग सुख-दुःख का अनुभव-कभी कभी सुखमात्र के संकुचित अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त होता है ।