प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ प्रत्यभिज्ञाहृदय भोक्ता सुखदुःख का अनुभव करनेवाला । म मध्य संवित्, शुद्ध अहन्ता, सुषुम्ना अर्थात् मध्यनाड़ी मध्यधाम सुषुम्ना, ब्रह्मनाड़ी मध्यमा स्थूल अभिव्यक्ति के पूर्व बुद्धिनिष्ठ वाक्शक्ति। मध्यशक्ति संवित् शक्ति मन्त्र वह प्रमाता जिसने शुद्ध विद्या का साक्षात्कार कर लिया है; विद्यातत्त्व में अध्यासीन प्रमाता; वह शब्द या शब्दसमूह जिसका जप या ध्यान किया जाय । मन्त्रमहेश्वर वह प्रमाता जिसने सदाशिवतत्त्व का साक्षा- त्कार कर लिया है । मन्त्रेश्वर वह प्रमाता जिसने ईश्वरतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है । महामन्त्र शुद्ध चेतना का, पूर्णाहन्ता का मन्त्र । महार्थ परमोत्कृष्ट लक्ष्य, शुद्धपूर्णाहन्तापद, कौल- साधना । महेश्वर परमेश्वर, परमशिव, अनुत्तर माध्यमिक बौद्ध मध्यमकदर्शन का अनुयायी । माया 'मा' धातु से निष्पन्न 'मापना' । अनन्त की मेय और परिच्छिन्न बनाने की, आवरण और विक्षेप की शक्ति, शुद्धविद्या से नीचे का तत्त्व, पाँच कञ्चुकों की योनि । मायाप्रमाता माया द्वारा वशीभूत जीव । मायीयमल माया के द्वारा मल या संकोच जिससे जीव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर बनते हैं और भेद की प्रतीति होती है । माहैश्वर्य महेश्वर की शक्ति । मीमांसक मीमांसा दर्शन का अनुयायी । मुक्ति आत्मतत्त्व का परिज्ञान, अज्ञानग्रंथि के भेद से स्वात्मशक्ति की अभिव्यक्ति, परमशिवी भाव । मुद्रा आध्यात्मिक आनन्द (मुद) को देनेवाली (रा) स्थिति, तुर्यचेतना में विश्व को मुहरबन्द