प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारिभाषिक शब्दों का कोश १५३ करनेवाली दशा (मुद्रयति इति), हाथ, गर्दन इत्यादि की विशेषभावसूचक स्थिति, योग में ध्यान के सहायक रूप में कुछ अवयवों का नियन्त्रण । मुद्राक्रम (अथवा क्रममुद्रा) तुरीया चितिशक्ति, वह अवस्था-विशेष जो सृष्टि-स्थिति-संहृति रूपी चक्र के क्रम को मुद्रित करता है अर्थात् आत्मसात् करता है, वह अवस्था विशेष जिसमें चित्त में समावेश के वेग से आभ्यन्तर और बाह्य में आत्मा और विश्व में क्रम से एकरूपता अर्थात् शिवात्मकता की संसिद्धि होती है । मेय भौतिक ज्ञेय, विषय, भौतिक पदार्थ । मोक्ष दे० मुक्ति र रक्ति आस्वाद, आनन्द, गूढ़ार्थ-स्थिति । रजस् प्रकृति का प्रवृत्तिरूपीगुण । राग माया का एक कंचुक जिसके द्वारा पूर्णत्व परिछिन्न हो जाता है और विषय-विशेष के लिए अभिलाषा उत्पन्न होती है । व वह्नि (वहू-ले जाना) शैव योग का एक पारिभाषिक शब्द जिसका अर्थ है अःधकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्ध भाग में पूर्ण रूप से प्रवेश करना दे० टि० १५७ । वाचक शब्द, संकेत । वाच्य जिसका अभिधाशक्ति से बोध हो, पदार्थ । वामेश्वरी परमशिव की वह शक्ति जो कि विश्व का वमन करती है, अर्थात् परमशिव से विश्व को बाहर प्रक्षिप्त करती है और इस प्रकार वाम चेतना अर्थात् अभेद में भेद उत्पन्न करती है । वाह सुषुम्ना की बाईं ओर ईडा नाड़ी में बहते हुए प्राणवायु और दाहिनी ओर पिंगला नाड़ी में बहते हुए अपान वायु की समुच्चयात्मक संज्ञा वाह है ।