प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ष षष्ठवक्त्र छठवाँ अवयव, गुदा के मूल के पास का मेद्रकंद स संवित् चेतना, परम चेतना । संवित् देवता समष्टि की दृष्टि से-खेचरी, गोचरी, दिक्- चरी और भूचरी संवित् देवता है, व्यष्टि की दृष्टि से आन्तरिक और बाह्य इन्द्रियाँ संवित् देवता हैं। संसार जगत्, जन्म-मरण । संसारी जीव जिसका संसरण ( जन्म-मरण ) होता रहता है। संसृति गमनागमन, जन्म-मरण का क्रम। संहार बटोर लेना, जगत् का शिव में लय । सकल देव से लेकर कीट तक सभी जीव जो माया- तत्त्व में हैं। इन्हें अपने आत्मा का बोध नहीं होता और इनमें भेद-बुद्धि बनी रहती है। सत् अस्तित्व जिसका स्वरूप चित् है। सत्त्व अस्तित्व, प्राण, प्रकृति का वह गुण जिसका लक्षण प्रकाश है। सदाशिव शिव से गिनने पर तीसरा तत्त्व, वह अवस्था विशेष जिसमें अहं (मैं) का प्राधान्य रहता है ओर इदं (यह विश्व) अस्फुट रहता है। इस तत्त्व का दूसरा नाम है सादाख्यतत्त्व । इस तत्त्व में इच्छा की प्रधानता होती है। समरस समचेतन समाधि चित्त की प्रगाढ एकाग्रता । समान पंचप्राणों में से वह प्राण अथवा वायु जो भोजन इत्यादि का समीकरण करता है और प्राण और अपान वायु का सन्तुलन करता हैं। समापत्ति समाधि की परिपूर्णता । समावेश शिव या शक्ति से आविष्ट होना, वैयक्तिक चेतना का ईश्वरीय चेतना में लय । सहज स्वाभाविक ।