भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१० पारिभाषिक शब्दों का कोश १४५ की ओर चलती है और आत्मिक चेतना घटित करती है । उद्वमन्ती शब्दार्थ-वमन करती हुई. भावार्थ—बाहर करती हुई, व्यक्त करती हुई । उन्मेष शब्दार्थ-आँख का खुलना। भावार्थ-सृष्टि का प्रारम्भ । शैवयोग में-आत्मिक चेतना का स्फुरण या विकास जो कि विचारों की स्पन्दभूमि या अधिष्ठान है । उन्मीलन शब्दार्थ-आँख का खुलना; भावार्थ-अव- स्थित का प्रकटीकरण, व्यक्त होना । उन्मीलन समाधि चित्त की वह स्थिति जिसमें आँख खुले रहने पर भी बाह्य जगत् सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है । ऊ ऊर्ध्वकुण्डलिनी जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश कर जाते हैं, तब ऊपर के भाग की कुण्डलिनी शक्ति । क कंचुक कोश करणेश्वर्यः खेचरी-गोचरी,-दिक्-चरी-भूचरी चक्र । कला कर्तृत्व, परिमितकर्तृत्व, अभिव्यक्ति की प्रावस्था, अंश, अक्षर या शब्दांश (ह कला- पर्यन्त) । कुल शक्ति कारण किसी का हेतुः वह जिससे कार्य की उत्पत्ति हो । कार्ममल कर्म के परिणामस्वरूप चित्त में अवस्थित वासना या संस्कार का मल । कार्य कारण का परिणाम काल वह शक्ति जिससे समय या क्रम निष्पन्न होता है । कालाग्नि निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन (दे० टि० १७४)