प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय अव्यक्त अप्रकट; अदृश्य, अनाविर्भूत । असत् जिसका अस्तित्व न हो, सत् से विपरीत । अहन्ता अहं अर्थात् मैं की चेतना । अहंभाव मैं का भाव, मैं की अनुभूति । आ आणवमल अणु अर्थात् जीव का जन्मजात अज्ञान, वह आद्य परिमितता जिसके द्वारा सार्वभौम चेतनता जीव बन जाती है, बोध से शक्ति चली जाती है और शक्ति से बोध चला जाता है और इस प्रकार अपूर्णता का बोध होता है। आत्मविश्रान्ति आत्मा में, अपने में विश्राम या ठहराव । आत्मसात्कार अपने में समीकरण; स्वांगीकरण । आदिकोटि प्रथम कोटि; हृदय जहाँ से प्राण उमड़ता है । आनन्द आनन्द; शक्ति का स्वरूप । आभासन शब्दार्थ-आभास, गूढ़ार्थ-सृष्टि । आर्हत जैन । आश्यानता सिमट जाने की स्थितिः सूख जाने की स्थिति; ठोस हो जाने की स्थिति । इ इच्छा सदाशिव की प्रधान चेतना । इदन्ता इदं (यह) की चेतना, यह का परामर्श । ई ईश्वरतत्त्व शिव से गिनने पर (शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर) चौथा तत्त्व; ईश्वर तत्त्व में अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों परामर्श (चेतना) स्फुट रहता है । इसमें अहं और इदं दोनों की चेतना उभरी हुई रहती है । ईश्वरभट्टारक ईश्वरतत्त्व में व्यवस्थित मंत्रेश्वरों का अधिष्ठाता । उ उदान वह प्राण जो ऊपर की ओर जाता है; वह प्राण वा शक्ति जो सुषुम्ना में होती हुई ऊपर