प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपारिभाषिक शब्दों का कोश अ अ अनुत्तर, शिव अकुल शिव, जो कुल अर्थात् शक्ति नहीं है, शिव है। अख्याति अज्ञान अधःकुण्डलिनी लम्बिका से लेकर मूलाधार के ३ १/२ वलय तक कुण्डलिनी का क्षेत्र (दे० टि० १६०) अधोवक्त्र गुदा के मूल में स्थित मेढ्रकन्द अनचक शब्दार्थ-व्यञ्जन का बिना स्वर के उच्चारण, गूढार्थ-किसी मंत्र की मानस अवस्था पर ध्यान जहाँ उसका उच्चारण नही होता। अनन्तभट्टारक मंत्रप्रमाताओं का अधिष्ठाता। अन्तकोटि अन्तिम स्थल; हृदय से बारह अंगुलियों के अन्तर का स्थल जिसे द्वादशान्त कहते हैं। अन्तर्मुखी भाव चित्त का भीतर की ओर मुड़ना, प्रत्यग्वृत्ति। अनाश्रितशिव शिव की वह अवस्था जिसमें कोई ग्राह्य नहीं है, जिसके सम्मुख केवल शून्य है, विश्व प्रति- षिद्ध हो गया है। अनुग्रह दैवीकृपा अनुत्तर जिससे बढ़कर और कोई नहीं है, परम असीमसत्, परमार्थ। अपर निम्न अपवर्ग मोक्ष अपान बाहर से भीतर की ओर, गुदा की ओर चलनेवासी वायु। अमायीय माया के प्रभाव से परे; अमायीय शब्द वह है जिसमें पद और अर्थ एकात्म होते हैं। अर्थ उद्देश्य; लक्ष्य; इन्द्रियों का विषय। अलंग्रास ग्राह्य को पूरी तौर से निगल जाना अर्थात् उसको इस प्रकार आत्मसात् कर लेना कि वह आत्मचेतना से भिन्न न जान पड़े।