प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४२ प्रत्यभिज्ञाहृदय निहित हैं। इसलिए व्याख्याकार क्षेमराज ने लिखा है कि 'अ' और 'ह' सम्पु- टीभूत रूप में समस्त सम्भाव्य विश्व को संगृहीत किये हुए अनुत्तर में, परम- शिव में, एक अविशिष्ट बिन्दु के रूप में पड़ा रहता है। बिन्दु अविशेष का, अभेद का द्योतक है। (संस्कृत) भाषा में बिन्दु अनुस्वार के द्वारा अक्षर के ऊपर एक बिन्दी रखकर व्यक्त किया जाता है। जैसा कि कहा जा चुका है, 'अ' और 'ह' में समस्त विश्व संगृहीत है। 'अ' और 'ह' के अविभाग को व्यक्त करने के लिए उस पर अनुस्वार का बिन्दु रखा हुआ है और इस प्रकार 'अह' 'अहं' के रूप में वर्तमान रहता है। यह अहं परमशिव का विमर्श है जो इस बात का द्योतक है कि समस्त विश्व बीज रूपेण शिव में निहित है और उससे अभिन्न है। 'अ' शिव का प्रतीक है, 'ह' शक्ति का प्रतीक है, उसपर जो अनुस्वार बिन्दु है, वह इस बात का द्योतक है कि यद्यपि शिव अपनी शक्ति के द्वारा पृथ्वी तक में व्यक्त है, वह इस व्यक्तीकरण से विभक्त नहीं हो जाता, वह स्वरूपतः अविभक्त, पूर्ण रहता है। इसी बात को क्षेमराज ने 'अविभागवेदनात्मक बिन्दुरूपतया' इन शब्दों में स्पष्ट किया है। १८३. प्रकाशस्य-मूल में जो 'प्रकाशस्य' शब्द है, उसका यहाँ पर अर्थ है 'घटसुखादिवेद्यप्रकाशस्य' घट (वाह्य) और सुख (आन्तरिक) जो कुछ भी वेद्य रूपी प्रकाश है उसकी (विश्रान्ति)। १८४. महाह्रद-महासरोवर। परम अहंविमर्श अथवा परम आध्यात्मिक आत्मचेतना को 'महाह्रद' कहा है। इसको 'महा' इसलिए कहा है क्योंकि यह अतिगंभीर है, स्वच्छ है और अपरिच्छिन्न है। १८५. 'सम्बन्ध स्थापित करने का भाव है' 'परमशिव के अहंविमर्श से तादात्म्य स्थापित करना।' १८६. 'विवरणकार' से कल्लटाचार्य का निर्देश किया है जो वसुगुप्त के शिष्य थे और जिन्होंने 'स्पन्दकारिका' पर एक वृत्ति लिखी थी। कल्लट ईसवी ६वीं शती में हुए थे। १८७. संवित्तिदेवताचक्र-जब इन्द्रियाँ पूर्ण रूपेण पवित्र होकर देवतातुल्य हो जाती हैं तब उनके चक्र (समूह) को 'सांवित्तिदेवताचक्र' कहते हैं। १८८. 'चक्रवर्ती' शब्द में श्लेष है। एक अर्थ है चक्र (इन्द्रियसम्मूह) का शासक। दूसरा अर्थ है 'सार्वभौम सम्राट्'।