भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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१४० प्रत्यभिज्ञाहृदय अवस्था है महेश्वर जिसकी आत्मसंवित्ति में समस्त सृष्टि समाविष्ट है और जिसका प्रकाश से एक सद्भाव है। १७८ आदिक्षान्तामायीयशब्दराशिपरमर्श—'अ' लेकर 'क्ष' तक अमा- यीय शब्द राशि की स्मृति के कारण—तंत्र के अनुसार पराशक्ति (चरम ईश्वरीय सर्जनात्मक शक्ति जिसके द्वारा विश्व का आविर्भाव होता है) और परावाक् (चरम ईश्वरीय शब्द जो समस्त शब्दराशि का उत्स हैं) एक ही है। प्रत्येक पद वाचक कहलाता है और प्रत्येक अर्थवाच्य कहलाता है। वाच्य वा अर्थ ईश्वरीय शब्द का आशय मात्र है, वह केवल ईश्वरीय शब्द का दृश्य रूप है। ईश्वरीय शब्द अमायीय है अर्थात् माया के क्षेत्र से परे है। शब्द दो प्रकार के हैं—मायीय (माया के क्षेत्र के) और अमायीय (माया के क्षेत्र से परे)। मायीय शब्द वे हैं जिनका अर्थ लौकिक परिपाटी के अनुसार आरोपित होता है। वे विकल्प मात्र हैं। अमायीय शब्द वे हैं जो निर्विकल्प हैं जिनका अर्थ सत्य है, जो कल्पना, आरोपण अथवा रूढ़ि के परिणाम नहीं हैं, जो चिन्मय हैं। परामर्श—जो कुछ वाच्य-वाचक जगत् है वह अमायीय शब्दराशि के रूप में महेश्वर में वर्तमान है। सृष्टि महेश्वर की अपनी शब्दराशि की स्मृति मात्र है, और कुछ नहीं। १७६, जगदानन्द—जगत् रूपी आनन्द। जगदानन्द इस दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में फूट निकलता है। इस दर्शन में जगत महेश्वर के आनन्द की च्युति नहीं है, प्रत्युत जगत् उसके आनन्द की अभिव्यक्ति है। जगत् उसके आनन्द का दृश्य रूप है। अभिनव गुप्त के जादानन्द के विषय में निम्नलिखित श्लोक हैं:— यत्रकोऽपि व्यदच्छेदोनास्तियद्विश्वतः स्फुरत् यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्तिभावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शंभुरुक्तवान् ॥ (तंत्रः खं० ३, ५ आ० ५०-५१) सब ओर से प्रकाशमान होने के कारण जिसमें कोई विभाग नहीं है, जिसमें चेतना अक्षुण्ण और अविकल है अर्थात् जिसमें चेतना ही अपने को प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में अभिव्यक्त कर रही है, जो महेश्वर के आनन्दरूपी अमृत से प्रसारित है जिसमें ध्यान इत्यादि की कोई आवश्यकता ही नहीं है वही जगदानन्द है—ऐसा मुझको शम्भु ने बतलाया है। (शम्भु अभिनवगुप्त के गुरु का नाम है जिन्होंने उनको त्रिकदर्शन सिखलाया था)।