भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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( ११ ) "सदेव सौम्य इदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्— तदैक्षत, बहु स्याम्, प्रजायेय इति । (६, २, १-३) पहले एक, द्वितीय के बिना सत् ही था। उसने ईक्षण किया' बहु हो जाऊँ, प्रजनन करूं। यह ईक्षितृत्व विमर्श या उन्मुखता के सदृश है, किन्तु शांकरवेदान्त ने इसके निहितार्थ को प्रस्फुटित नहीं किया। शैवदर्शन परम शिव को एक शुष्कतार्किक के रूप में नहीं मानता, वह उसे एक कलाकार के रूप में देखता है। जैसे एक कलाकार अपने आनन्द को अपने भीतर ही नहीं रख सकता, किन्तु उसे गान, चित्र या कविता में उड़ेल देता है, इसी प्रकार सर्वोच्चकलाकार परमशिव अपने वैभव के आनन्द- पूर्ण चमत्कार को प्रव्यक्ति या सृष्टि में उड़ेल देता है। क्षेमराज ने उत्पलदेव की स्तोत्रावली की व्याख्या में इसी विचार को निम्नलिखित रूप में व्यक्त किया है। 'आनन्दोच्छलिता शक्तिः सृजत्यामानमात्मना' अर्थात् शक्ति आनन्द से उच्छलित होकर अपने को अपने ही द्वारा सृष्टि के रूप में प्रकट करती है। समस्त सृष्टि शिव की सृष्टिकल्पना की बाह्या- भिव्यक्ति है। शक्ति तत्त्व में महेश्वर के आनन्द का प्राधान्य है। शिव और शक्ति तत्त्व कभी पृथक् नहीं रह सकते। वे सृष्टि और संसार दोनों में संयुक्त रहते हैं— शिव ईक्षिता के रूप में और शक्ति आनन्द के रूप में। वस्तुतः शिव-शक्ति तत्त्व आभास नहीं है, सभी आभासों का बीज है। ३-सदाशिव अथवा सादाख्य तत्त्व :— इदं के प्रतिज्ञापन की इच्छा सदाशिव तत्त्व अथवा सादाख्य तत्त्व है। सदाशिव में इच्छा का प्रधान्य है। इस अवस्था का अनुभव है 'मैं हूँ' यतः इस अवस्था में होने का प्रतिज्ञापन होता है अतः यह सादाख्यतत्त्व कहलाता है। सत् का अर्थ है होना, और होने में इदं (यह) ध्वनित है। मैं हूं -क्या हूं-यह (इदं) हूं। इस अवस्था का अनुभव है 'अहं इदं' (मैं यह हूं) किन्तु इदं (यह) अभी अस्फुट है। अहं (मैं) ही अभी प्रधान है। इस अवस्थामें विश्व अभी अस्फुट इदं मात्र है। इसीलिए इस अवस्था को प्रायः निमेष कहा गया है (निमेषोऽन्तः सदाशिवः ) । इस अवस्था में अहं जो