प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) अस्फुट रूप में 'इदं' है उसको अपनाही अंश समझता है। अभी प्रमुखता अहं की ही है। जैसे चित्रकार के मन में चित्र प्राथमिक अवस्था में एक अस्फुट, धुंधले रूप में रहता है वैसे ही सदाशिव में इदं अर्थात् विश्व अभी अस्फुट रूप में रहता है। राजानक आनन्द ने षट्त्रिंशत्तत्व सन्दोह पर लिखे हुए अपने विवरण में ठीक ही कहा है :— “तत्र प्रोन्मीलितमात्रचित्रकल्पतया इदमंशस्य अस्फुटत्वात् इच्छाप्राधान्यम्” (पृ० ३') अर्थात् इस अवस्था में इदं अंश (विश्व) वैसे ही अस्फुट रहता है जैसे एक चित्रकार का चित्र जो कि बनाया जाने वाला है पहले मन में धुँधले रूप में रहता है। अतः इस अवस्था में इच्छा का ही प्राधान्य है। क्षेमराज प्रत्यभिज्ञाहृदय में कहते हैं : “सदाशिवतत्त्वेऽहन्ताच्छादितास्फुटेदन्तामयं विश्वम्” अर्थात् सदाशिवतत्त्व में इदन्तामय विश्व अभी अस्फुट (अस्पष्ट) रहता, है, अभी वह अहन्ता से आच्छादित रहता है अर्थात् अभी अहंभाव का ही प्राधान्य रहता है। सदाशिव प्रथम आभास है। आभास के लिए एक द्रष्टा या प्रमाता होना चाहिए और एक दृश्य या प्रमेय होना चाहिए। इस सर्वव्यापी दशा में प्रमाता और प्रमेय दोनों चेतना ही है, क्योंकि इस दशा में चेतना के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं। चेतना इस दशा में स्वयं अपना प्रमेय है; प्रमाता भी वही है, प्रमेय भी वही है। ४ ईश्वरतत्त्वः— पारमेश्वरीय अनुभव की परवर्ती अवस्था वह है जिसमें समग्र अनुभव का इदमंश और अधिक स्फुट हो जाता है। इसको ईश्वरतत्त्व कहते हैं। यह उन्मेष है अर्थात् यह विश्व का स्फुट रूप से खिल उठना है। इस अवस्था में ज्ञान का प्राधान्य रहता है। राजानक आनन्द अपने विवरण में कहते हैं :— “अत्र वेद्यजातस्य स्फुटावभासनात् ज्ञानशक्त्युद्रेकः' अर्थात् इस अवस्था में वेद्य या प्रमेय अधिक स्फुट होता है, इसलिए ज्ञानशक्ति का प्राधान्य है। जैसे चित्रकार के मन में प्रदर्श्य चित्र की पहले एक धुँधली सी रूपरेखा होती है, फिर उसका अधिक स्पष्ट रूप उमगने लगता है, वैसे ही सदाशिव की अवस्था में विश्व अस्फुट रहता है और ईश्वर