भारतकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

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( १३ ) की अवस्था में वह अधिक स्फुट हो उठता है। सदाशिव का परामर्श है' 'अहम् इदम्' । ईश्वर का परामर्श है 'इदम् अहम्' । ५- सद्विद्या अथवा शुद्धविद्यातत्त्व :- सद्विद्यातत्वमें अहम् और इदम् दोनोंपरामर्श एक समान होते है जैसे समाधृत तुला के दोनों पलड़े बराबर होते हैं (समाधृततुलापुटन्यायेन) । इस अवस्था में क्रिया शक्ति का प्राधान्य होता है। इस अवस्था में अहम् और इदम् दोनों का परामर्श इस प्रकार समानरूप से स्फुट होता है कि यद्यपि अब भी अहम् और इदम् दोनों एकसम हैं तथापि दोनों की पृथक् विशिष्टता प्रतीत होती है। उस अवस्था का अनुभव भेदाभेदविमर्शानात्मक होता है अर्थात् यद्यपि ईदम् का अहम् से भेद प्रतीत होता है तथापि इदम् अहम् का अंग ही जान पड़ता है। अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य जान पड़ता है। शिव तत्त्व में 'अहं' परामर्श है; सदाशिव तत्त्व में 'अहमिदम्' परामर्श है; ईश्वर तत्त्व में 'इदमहं' परामर्श है। इन सब परामर्शों में पहले पद की प्रमुखता होती है। शुद्धविद्यातत्त्व में दोनों पदों का परामर्श समानरूप से होता है (अहम् अहम्, इदम् इदम् अथवा अहं च, इदंच ) यह परामर्श पर ( अभेद की दशा ) और अपर (भेद की दशा) दोनों के मध्य का है। इसलिए इसको परापरदशा कहते हैं । इसको 'सद्विद्या या शुद्धविद्या' इसलिए कहते हैं क्योंकि इस अवस्था में पदार्थों के वास्तविक सम्बन्ध का परामर्श होता है। इस अवस्था तक सभी परामर्श मानसिक या चैत्य होता है। इसलिए यहां तक शुद्धाध्वा कहलाता हैं, क्योंकि यहां तक महेश्वर का स्वरूप-गोपन नहीं होता। (ii) परिमित अनुभव के तत्त्व :- ६-११ माया और उसके पांच कंचुक :- अब माया तत्त्व का कार्य प्रारम्भ होता है। यहाँ से अशुद्धाध्वा का प्रारम्भ होता है जिसमें महेश्वर का स्वरूप-गोपन होता है। यह स्वरूप-गोपन माया और उसके कंचुकों द्वारा होता है। माया शब्द 'मा' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है मापना, माप कर पृथक् कर देना, परिमित कर देना। जो अनुभव को मेय या परिमित बना देती है, अहम् को इदम् से और इदम् को अहम् से पृथक् कर देती है, भेद उत्पन्न कर देती है, वस्तुओं को एक दूसरे से भिन्न कर देती है, वह माया है। सद्विद्या तक अनुभव सार्वभौमिक होता है, अपरिमित होता है 'इदं' का भाव होता है- 'यह सब कुछ' 'समस्तविश्व' । माया के प्रभावसे 'इदं' का