भारतकोश
संग्रह पर लौटें

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

( १३ ) की अवस्था में वह अधिक स्फुट हो उठता है। सदाशिव का परामर्श है' 'अहम् इदम्' । ईश्वर का परामर्श है 'इदम् अहम्' । ५- सद्विद्या अथवा शुद्धविद्यातत्त्व :- सद्विद्यातत्वमें अहम् और इदम् दोनोंपरामर्श एक समान होते है जैसे समाधृत तुला के दोनों पलड़े बराबर होते हैं (समाधृततुलापुटन्यायेन) । इस अवस्था में क्रिया शक्ति का प्राधान्य होता है। इस अवस्था में अहम् और इदम् दोनों का परामर्श इस प्रकार समानरूप से स्फुट होता है कि यद्यपि अब भी अहम् और इदम् दोनों एकसम हैं तथापि दोनों की पृथक् विशिष्टता प्रतीत होती है। उस अवस्था का अनुभव भेदाभेदविमर्शानात्मक होता है अर्थात् यद्यपि ईदम् का अहम् से भेद प्रतीत होता है तथापि इदम् अहम् का अंग ही जान पड़ता है। अहम् और इदम् का सामानाधिकरण्य जान पड़ता है। शिव तत्त्व में 'अहं' परामर्श है; सदाशिव तत्त्व में 'अहमिदम्' परामर्श है; ईश्वर तत्त्व में 'इदमहं' परामर्श है। इन सब परामर्शों में पहले पद की प्रमुखता होती है। शुद्धविद्यातत्त्व में दोनों पदों का परामर्श समानरूप से होता है (अहम् अहम्, इदम् इदम् अथवा अहं च, इदंच ) यह परामर्श पर ( अभेद की दशा ) और अपर (भेद की दशा) दोनों के मध्य का है। इसलिए इसको परापरदशा कहते हैं । इसको 'सद्विद्या या शुद्धविद्या' इसलिए कहते हैं क्योंकि इस अवस्था में पदार्थों के वास्तविक सम्बन्ध का परामर्श होता है। इस अवस्था तक सभी परामर्श मानसिक या चैत्य होता है। इसलिए यहां तक शुद्धाध्वा कहलाता हैं, क्योंकि यहां तक महेश्वर का स्वरूप-गोपन नहीं होता। (ii) परिमित अनुभव के तत्त्व :- ६-११ माया और उसके पांच कंचुक :- अब माया तत्त्व का कार्य प्रारम्भ होता है। यहाँ से अशुद्धाध्वा का प्रारम्भ होता है जिसमें महेश्वर का स्वरूप-गोपन होता है। यह स्वरूप-गोपन माया और उसके कंचुकों द्वारा होता है। माया शब्द 'मा' धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ होता है मापना, माप कर पृथक् कर देना, परिमित कर देना। जो अनुभव को मेय या परिमित बना देती है, अहम् को इदम् से और इदम् को अहम् से पृथक् कर देती है, भेद उत्पन्न कर देती है, वस्तुओं को एक दूसरे से भिन्न कर देती है, वह माया है। सद्विद्या तक अनुभव सार्वभौमिक होता है, अपरिमित होता है 'इदं' का भाव होता है- 'यह सब कुछ' 'समस्तविश्व' । माया के प्रभावसे 'इदं' का

( १४ ) अर्थ हो जाता है 'केवल यह' 'अन्य सब वस्तुओं से भिन्न एक परिमित वस्तु' । यहीं माया के द्वारा पूर्ण संकोच या परिमितत्व प्रारम्भ हो जाता है । माया आत्मा पर एक आवरण डाल देती है और भेद-बुद्धि उत्पन्न कर देती है । माया के परिणाम पांच कंचुक हैं । संक्षेप में वे इस प्रकार हैं :- १. कला-परमेश्वर का स्वरूप गोपित होने पर, अणु बनने पर, जिसके द्वारा उसका सर्वकर्तृत्व संकुचित होकर किंचित्कर्तृत्व में परिणत हो जाता है उसे 'कला' कहते हैं । २. विद्या-जिसके द्वारा परमेश्वर का सर्वज्ञत्व संकुचित होकर किंचित् ज्ञत्व में परिणत हो जाता है उसे 'विद्या' कहते हैं । ३. राग-जिसके द्वारा परमेश्वर की पूर्णतृप्ति संकुचित होकर यत्किंचित भोगों में आसक्त हो जाती है उसे 'राग' कहते हैं । ४. काल-जिसके द्वारा परमेश्वर का नित्यत्व संकुचित होकर अतीत, वर्तमान, और अनागत में परिच्छिन्न हो जाता है उसे काल कहते हैं । ५. नियति-जिसके द्वारा परमेश्वर का स्वातंत्र्य संकुचित होकर विशिष्ट कार्य के लिए विशिष्ट कारण का नियम धारण करता है और उसका व्यापकत्व संकुचित होकर किसी विशिष्ट देश में परिच्छिन्न हो जाता है उसे नियति कहते हैं । (iii) परिमित व्यक्ति या जीवन के तत्त्व-वेदक-वेद्य १२ पुरुष शिव जब कंचकों सहित माया को स्वीकार कर लेता है तब उसका सार्वभौम ज्ञान और ऐश्वर्य संकुचित हो जाता है और वह पुरुष या एक परिमित व्यक्ति बन जाता है । पुरुष से तात्पर्य केवल मानवीय व्यक्ति से नहीं है, अपितु प्रत्येक संकुचित वेदन-शील प्राणी से है । पुरुष को अणु भी कहते हैं । अणु कोई दैशिक बिन्दु नहीं है । महेश्वर के पूर्णत्व के परिमितत्व के कारण ही कोई जीव अणु कहलाता है । "पूर्णत्वा- भावेन परिमितत्वादणुत्वम् ।" १३ प्रकृति : सद्विद्या की 'अहं च इदं च' की जो अनुभूति है उसमें से अहं अंश की अभिव्यक्ति पुरुष है और इदं अंश की अभिव्यक्ति प्रकृति है । त्रिक के अनुसार प्रकृति या प्रधान कला का वेद्यरूप कार्य है । ( वेद्यमात्रं स्फुटं भिन्नं प्रधानं सूयते कला-तंत्रालोक, आ०६ ) ।

( १५ ) पुरुष वेदक है, प्रकृति वेद्यमात्र है। प्रकृति अपने गुणों की साम्यावस्था में रहती है। प्रकृति की अवधारणा सांख्य और त्रिक की थोड़ी भिन्न है। सांख्य यह मानता है कि प्रकृति एक है और सभी पूरुषों के लिए सामान्य है। त्रिक यह मानता है कि प्रत्येक पुरुष की प्रकृति भिन्न है। प्रकृति वेद्य की योनि है। प्रकृति के तोन गुण हैं-सत्व, रजस् और तमस्। प्रकृति शिव की सान्ता शक्ति है और सत्व, रजस् और तमस् उनकी ज्ञान, इच्छा और क्रिया शक्ति के स्थूल रूप हैं। पुरुष भोक्ता और प्रकृति भोग्या है। iv-मानस व्यापार के तत्व: १४-१६ बुद्धि, अहंकार और मनस् प्रकृति के विशेष हैं - अन्तः करण, इन्द्रिय और भूत । अन्तःकरण का अर्थ है आन्तरिक साधन । इसमें बुद्धि, अहंकार और मनस् अन्तर्भूत हैं । १. बुद्धि प्रकृति का प्रथम तत्त्व है। यह व्यवसायात्मिका (निश्चयात्मिका) होती हैं। बुद्धि के दो प्रकार के अनुभव हैं : (१) बाह्य जो इन्द्रियों द्वारा ग्राह्य है, जैसे घट (२) आन्तरिक-संस्कारों द्वारा उद्भूत कल्पनाएं । २. अहंकार-जिसके द्वारा अहं प्रतीति होती है और सब ग्राह्य यां वेद्य अभिमत होते हैं अर्थात् वे अपने माने जाते हैं। अहंकार बुद्धि का परिणाम है। ३. मनस्-यह अहंकार का परिणाम है। यह इन्द्रियों के सहयोग से प्रत्यक्ष का अनुभव करता है और संकल्प-विकल्प करता रहता है। v-vii-प्रत्यक्ष करने के तत्व : १७-३१: (क) ज्ञानेन्द्रियां या बुद्धीन्द्रियां - ये अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्न- लिखित हैं :- १. घ्राणेन्द्रिय २--रसनेन्द्रिय, ३--चक्षुरिन्द्रिय ४--स्पर्शनेन्द्रिय, ५- श्रवणेन्द्रिय । (ख) कर्मेन्द्रियां-ये भी अहंकार के परिणाम हैं । ये निम्नलिखित हैं:- १. वागिन्द्रिय, २-हस्तेन्द्रिय ३-पादेन्द्रिय ४-पायु (इन्द्रिय) ५-उपस्थ ( इन्द्रिय )

१. प्रथम भाग (सूत्र १-६): चिति-शक्ति स्वरूप, जगत्-उन्मीलन एवं संकोच-विकास

( १६ ) ये सब इन्द्रियां शक्तियां हैं जो भिन्न इन्द्रियावयवों द्वारा अपना कार्य करती हैं। (ग) पंचतन्मात्राएं-ये भी अहंकार के परिणाम हैं। ये विशेष प्रत्यक्ष के सामान्य तत्त्व हैं :- १. शब्दतन्मात्र, २-स्पर्शतन्मात्र ३-रूपतन्मात्र ४-रसतन्मात्र, ५-गन्ध- तन्मात्र। viii-भौतिक तत्त्व : ३२-३६ : पंचमहाभूत । ये पंचमहाभूत पंचतन्मात्राओं के परिणाम हैं। (१) शब्दतन्मात्र का परिणाम है आकाश (२) स्पर्शतन्मात्र ” ” वायु (३) रूपतन्मात्र ” ” अग्नि या तेज (४) रसतन्मात्र ” ” आप (जल) (५) गन्धतन्मात्र ” ” पृथिवी ३-स्वातंत्र्यवाद और आभासवाद :- इस दर्शन में परमार्थ या परमसत् को चित्, परमशिव या महेश्वर कहते हैं। प्रकृति में दिखलाई देनेवाली प्ररचना और विन्यास के आधार पर साधा- रणतः जो ईश्वरनामक एक आद्य कारण का अनुमान किया जाता है उस अर्थ में इस दर्शन में परमार्थ को महेश्वर नहीं कहते हैं। परम सत् को उसकी इच्छा की निरपेक्ष पूर्ण प्रभुता अथवा स्वातंत्र्य की दृष्टि से महेश्वर कहते हैं। निरपेक्ष, निर्बाध प्रभुता या स्वातंत्र्य एक अन्ध शक्ति नहीं है। यह चित् का स्वभाव है। यह स्वातंत्र्य ही महेश्वर की कल्पना का वेद्यरूपेण उपस्थापन करता है। यह शक्ति स्वतंत्र इसलिए कहलाली है क्योंकि यह अपने से बाह्य किसी उपादान या उपकरण पर आश्रित नहीं है। यह कुछ भी होने या करने में स्वतंत्र और समर्थ है। यह देश, काल कारण इत्यादि से परे है, क्योंकि इनकी अपनी सत्ता उसी के द्वारा है। “चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परावाक् स्वरसोदिता स्वातंत्र्यमेतन्मुख्यम् तदैश्वर्य परमात्मनः” (ई० प्र० वि० १ पृ० २० ३-४) 'महेश्वर की शक्ति चिति कहलाती है। इसका स्वरूप स्वसंवित्ति है। इसे परावाक् भी कहते हैं। यह स्वयं नित्योदित है। यही स्वातंत्र्य है। यही

२ ( १७ ) परमात्मा का मुख्य ऐश्वर्य है'। परावाक्, विमर्श, ऐश्वर्य इत्यादि स्वातंत्र्य के पर्यायवाची शब्द हैं। “सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिणी सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः” (ई० प्र० वि० १,२०७-८) यह (चिति) वह स्फुरत्ता है जो अपने में विकार-हीन होते हुए सब विकारों की जननी है। यह महासत्ता है, क्योंकि सब कुछ होने में यह स्वतंत्र है। यह देश और काल से परे है। यह परमशिव का हृदय-स्वरूप है। स्वातंत्र्य या माहेश्वर्य का भाव है 'बिना किसी बाह्य उपादान के, बिना किसी बाधा के अपने आप सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य ।' “स्वातंत्र्यं च नाम यथेच्छं तत्रेच्छाप्रसरस्य अविघातः” स्वातंत्र्य का भाव है अपनी इच्छा के अनुसार, उस इच्छा के प्रसर में बिना किसी रुकावट के सब कुछ कर डालने का सामर्थ्य । स्वातंत्र्यवाद की व्याख्या अभिनवगुप्त ने बहुत सुन्दर शब्दों में इस प्रकार की है। “तस्मादनपह्नवनीयः प्रकाशविमर्शात्मा संवित्स्वभावः परमशिवो भगवान् स्वातंत्र्यादेव रुद्रादिस्थावरान्तप्रमातृरूपतया नीलसुखादिप्रमेयरूप- तया च अनतिरिक्त्यापि अतिरिक्त्या इव स्वरूपानाच्छादिकया संविद्रूपनान्तरी- यकस्वातंत्र्यमहिम्ना प्रकाश इति अयं स्वातंत्र्यवादः प्रोन्मीलितः (ई० प्र० वि० वि० पृ०६) । “इसलिए प्रकाशविमर्शस्वरूप संविद्रूपी परमशिव जिसका कभी भी अपलाप नहीं किया जा सकता, जो सदा उदित है अपने स्वातंत्र्य के माहात्म्य से ही जो कि संवित् से पृथक् नहीं है रुद्र से लेकर स्थावर तक प्रमाता के रूप में और नील, सुख इत्यादि प्रमेय के रूप में प्रकट होता है। ये प्रमाता और प्रमेय उससे अभिन्न होते हुए भी भिन्न की भांति भासित होते हैं, किन्तु ये उसके स्वरूप को कभी ढक नहीं सकते। इस प्रकार स्वातंत्र्यवाद का प्रस्तुती- करण किया गया है। आभासवाद :- महेश्वर के सर्जन की दृष्टि से यह दर्शन स्वातंत्र्यवाद कहलाता है, उसकी अभिव्यक्ति या आविर्भाव की दृष्टि से यह आभासवाद कहलाता है। जैसे मयूर का सुन्दर रंग-बिरंगा पिच्छकलाप (पंख) उसके अंडे के रस में अविभिन्नरूप से निहित रहता है वैसे ही समस्त विश्व महेश्वर में अविभिन्न

( १८ ) रूप से विद्यमान रहता है। इस सादृश्य को इस दर्शन में मयूराण्डरस न्याय कहते हैं। समस्त विश्व का अधिष्ठान चित् या संवित् है। चित्र-विचित्र, सदा परिवर्तनशील आभास उसी चित् के आविर्भाव मात्र हैं। जो कुछ भी किसी भी रूप में प्रकट है, चाहे प्रमेय के रूप में, चाहे प्रमाताके रूप में, चाहे ज्ञान के रूप में, चाहे ज्ञान के साधन या इन्द्रियों के रूप में, वह सब कुछ उसी परमचित् का 'आभास' मात्र है। 'आभास' का अर्थ है 'आ' ( ईषत् अर्थात् संकुचित रूप में) 'भासः (प्रकाशन) 'कुछ संकुचित रूप में भासन या प्रकाशन' आभास कहलाता है। सभी प्रकार का आविर्भाव परिसीमित होता है। जो कुछ भी विद्यमान है वह आभासों का विन्यास मात्र है। दर्पणबिम्बेयद्वन् नगरग्रामादिचित्रमविभागि । भातिविभागेनैव च परस्परं दर्पणादपि च ॥ विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वत् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ( परमार्थसार : श्लो० १२, १३) । जैसे स्वच्छ दर्पण में चित्र-विचित्र नगर, ग्राम इत्यादि के प्रतिबिम्ब दर्पण से अभिन्न होते हुए भी, परस्पर और दर्पण से भी भिन्न भासित होते हैं, वैसे ही यह जगत् परमशिव के विमल संवित् से अभिन्न होते हुए भी परस्पर और उस संवित् से भी भिन्न भासित होता है। आभास दर्पण में प्रतिबिम्बित आकारों के समान हैं। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब उससे भिन्न नहीं किन्तु भिन्न भासित होता है, इसी प्रकार आभास भी शिव से भिन्न नहीं हैं, किन्तु भिन्न भासित होते हैं। जैसे दर्पण में प्रति- बिम्बित नगर, ग्राम, नदी, वृक्ष इत्यादि यद्यपि दर्पण से अभिन्न हैं तथापि उससे भिन्न भासित होते हैं, उसी प्रकार महेश्वर के संवित् में प्रतिबिम्बित जगत् उससे भिन्न नहीं है। इस दर्पण की उपमा में दो अपवाद मननीय हैं। (१) दर्पण में कोई बाह्य पदार्थ प्रतिबिम्बित होता है। महेश्वर की सार्वभौम चेतना में उसी की ही सृष्टिकल्पना प्रतिबिम्बित होती है, कोई बाह्य पदार्थ नहीं। दर्पण में एक बाह्य प्रकाश के द्वारा ही प्रतिबिम्ब सम्भव है, महेश्वर की सार्वभौम चेतना स्वयं अपना प्रकाश है, वह सब प्रकाशों का प्रकाश है, उसे किसी बाह्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है।

( १६ )

(२) दर्पण अचेतन है। उसे अपने भीतर के प्रतिबिम्बों का बोध नहीं है, किन्तु महेश्वर तो चेतन है। उसकी चेतना में जो प्रतिबिम्बवत् कल्पनाएं प्रकट होती हैं उनका उसको पूरा बोध रहता है। आभास जो कि पशु या परिच्छिन्न जीवों को बाह्य रूप में प्रतीत होते हैं परम चेतना की कल्पनाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। अन्तर्विभाति सकलं जगदात्मनीह यद्वद् विचित्ररचना मुकुरान्तराले । बोधः पुननिजविमर्शनसारयुक्त्या विश्वं परामृशति नो मुकुरस्तथा ॥ ( प० सा० में योगराज द्वारा उद्धृत पृ० ३६ ) जैसे चित्र-विचित्र पदार्थ दर्पण के भीतर प्रकट होते हैं, वैसे ही परम संवित् में जगत् प्रकट होता हैं। किन्तु परमसंवित् को विमर्शशक्ति के द्वारा उसका बोध रहता है, दर्पण में उस प्रकार अपने में प्रतिबिम्बित पदार्थ का बोध नहीं रहता । समुद्र में तरंग के समान चेतना में आभास उठते हैं। जैसे तरंगों के उत्थान और पतन से, समुद्र को न तो कोई लाभ है, न हानि, वैसे ही आभासों के उत्थान और पतन से परम चेतना को न कोई लाभ है, न हानि । आभास प्रकट और लीन होते रहते हैं, किन्तु उनकी अधिष्ठानरूपी चेतना में कोई विकार या परिवर्तन नहीं होता । अभास महेश्वर की कल्पनाओं का वहिः प्रक्षेप मात्र हैं। चिदात्मैव हि देवोऽन्तः स्थितमिच्छावशाद्बहिः योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ( ई० प्र० वि० पृ० १८५ ) चित्स्वरूप देव अन्तः स्थित पदार्थ समूह को अपनी इच्छा द्वारा बाहर प्रका- शित करता है जैसे योगी (संकल्प द्वारा कोई वस्तु बाहर आभासित कर देता है)। जैसे कुम्भकार मिट्टी लेकर बर्तन बनाता है उस प्रकार महेश्वर सृष्टि नहीं करता। सृष्टि का केवल अर्थ है अन्तः स्थित कल्पनाओं को बाहर आभा- सित कर देना । महेश्वर को इसके लिए किसी बाह्य उपादान की आव- श्यकता नहीं होती। वह अपनी इच्छा द्वारा ही ऐसा करने में समर्थ है। जो पदार्थ महेश्वर के ज्ञान-स्वरूप हैं वे उसकी इच्छा से ज्ञेय के रूप में प्रकट होते हैं, जो उसके अहं स्वरूप हैं वे इदं या विश्व के रूप में प्रकट होते हैं। जीवों को वे बाह्य रूप में आभासित होते हैं ।

( २० ) चित्स्वरूप महेश्वर ही प्रमाता और प्रमेयों के रूप में आभासित होता है। इसलिए आभास मिथ्या नहीं कहे जा सकते। आभास महेश्वर की पूर्णता में कोई अन्तर नहीं ला सकता। इस दर्शन का स्वातंत्र्यवाद विवर्तवाद के विपरीत है, और आभासवाद परिणामवाद के विपरीत है। ४-षडध्वा :- परा-शक्ति की दृष्टि से, इस दर्शन में सृष्टि का वर्णन निम्नप्रकार से किया जाता है। सृष्टि के मूल में एक असीम प्रभविष्णुता या शक्ति का अटूट क्रम है जिसे नाद कहते हैं। यह एक क्रियाशील बिन्दु में घनीभूत हो जाता है। यही सब अभिव्यक्ति या सृष्टि का मूल है। सृष्टि की परावस्था में वाचक और वाच्य, पद और अर्थ एक हैं। उसके अनन्तर सृष्टि का छः अध्वा या अवस्थाएं होती हैं जिन्हें षडध्वा कहते हैं। प्रथम अध्वा वर्ण और कला का है। वैसे मुख्यतः कला परमार्थ या अनुत्तर का वह प्ररूप है जिसके द्वारा वह सृष्टि के लिए शक्तिरूप में प्रकट होती है। परमशिव की विश्वोत्तीर्ण अवस्था निष्कल कही जाती है, क्योंकि वह कला या सृष्टि के प्राकट्य से परे है। शिव की विश्वमय अवस्था सकल कही जाती है, क्योकि वह सृष्टि से सम्बद्ध है। किन्तु इस संदर्भ में नाद-बिन्दु के अनन्तर जो कला का प्रयोग है उसका अर्थ है सृष्टि की एक 'क्रमावस्था'। कला वह अवस्था है जहां कि एक के अनन्तर असदृशता या विभेद प्रकट होने लगता है। परावाक् में वाचक और वाच्य एक थे, वे अब द्वन्द्व भाव में विभिन्न होने लगते हैं। इस द्वन्द्वभाव या विभिन्नता का पहला अध्वा है वर्ण और कला की विपरीतता। स्वामी प्रत्या- गात्मानन्द सरस्वती ने अपने एक लेख में बहुत ठीक कहा है कि इस सन्दर्भ में वर्ण का अर्थ अक्षर, रंग या वर्ग नहीं है, प्रत्युत बिन्दु से जो वेद्य या अर्थ प्रक्षिप्त होता है उसका एक प्रक्रियारूप है। इस लिए वर्ण का भाव है "अर्थ सेसम्बद्ध प्रक्रिया-रूप का विशिष्ट मान-अभिसूचक' (measure index)"। वर्ण प्रक्रियाया-रूप ( functiou form ) है, कला विधेय-धर्म ( predi cable ) है। सूक्ष्म भूमि में परवर्ती अध्वा मंत्र और तत्त्व है। मंत्र सृष्टि के अगले क्रम 'तत्त्व' का उपयुक्त 'प्रक्रिया-रूप' या 'आधारात्मक व्यवस्था' है। 'तत्त्व' सूक्ष्म निर्मिति का अन्तर्निहित सूत्र या उत्स है।

( २१ ) तीसरा और अन्तिम द्वन्द्व 'पद' और 'भुवन' का है। 'भुवन' भिन्न-भिन्न स्तरों पर प्रमाताओं की प्रतीति के योग्य जगत् है। 'पद' उस जगत् की मानसिक प्रतिक्रिया और शब्द द्वारा वास्तविक निरूपण हैं। निम्नलिखित सारणी में षडध्वा संक्षेपतः इस प्रकार रखा जा सकता है। वाचक वाच्य वर्ण कला मंत्र तत्त्व पद भुवन वाचक की ओर के त्रिक को 'कालाध्वा' कहते हैं, वाच्य की ओर के त्रिक को 'देशाध्वा' कहते हैं। 'वर्णाध्वा' प्रमास्वरूप है। वह प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय का विश्रान्ति- धाम है। वर्ण दो प्रकार का होता है। अमायीय और मायीय। मायीय वर्ण अमायीय से उत्पन्न होते हैं। अमायीय वर्ण अकृत्रिम, संकोच रहित और अनन्त होते हैं। मायीय वर्णों में अमायीय वर्णों की वाचक शक्ति उसी प्रकार निहित रहती है जैसे अग्नि में उष्णता। कला पांच हैं-१. निवृत्तिकला २. प्रतिष्ठाकला, ३. विद्याकला, ४. शान्ता या शान्तिकला। ५. शान्त्यतीताकला। प्रत्येक कला में कितने तत्त्व और भुवन हैं इसके लिए टिप्पणी १७४ से संलग्न रेखा चित्र को देखिए। अभिनवगुप्त के अनुसार ११८ भुवन हैं; कुछ और मत के अनुसार २२४ भुवन हैं। ५-शांकर अद्वैतवाद के साथ ईश्वराद्वयवाद (प्रत्यभिज्ञादर्शन) की तुलना :- श्री शंकराचार्य के दर्शन को अद्वैत शैववाद में प्रायः शान्तब्रह्मवाद, अथवा केवलाद्वैतवाद अथवा कभी-कभी मायावेदान्तवाद कहते हैं। अद्वैत शैववाद के ईश्वराद्वयवाद, प्रत्यभिज्ञादर्शन, या त्रिकदर्शन ये नाम प्रसिद्ध हैं। शंकराचार्य यह मानते हैं कि ब्रह्म निष्क्रिय है। अतः अद्वैत शैववाद शंकराचार्य के दर्शन को शान्तब्रह्मवाद कहता है। शान्तब्रह्मवाद और ईश्वराद्वयवाद का प्रथम मुख्य भेद यह है कि शान्तब्रह्मवाद के अनुसार चित् या ब्रह्म का वैशिष्ट्य है प्रकाश या ज्ञान, जब कि ईश्वरा- द्वयवाद के अनुसार चित् 'प्रकाश और विमर्श'-स्वरूप है। दूसरे शब्दों में

( २१ ) शंकर के अनुसार ब्रह्म ज्ञान मात्र है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद के अनुसार उसका वैशिष्ट्य ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों है। शंकर समझते हैं कि क्रिया केवल जीव का धर्म है, ब्रह्म में क्रिया नहीं है। शंकर ने क्रिया शब्द को बहुत ही संकुचित अर्थ में लिया है। शैव दर्शन कर्तृत्व को बहुत व्यापक अर्थ में लेता है; इसके अनुसार ज्ञान भी प्रभु की एक क्रिया है। कर्तृत्व के बिना चित् या परमेश्वर जड़ के समान हो जायगा और कुछ भी घटित नहीं कर सकता। परमशिव या परमेश्वर स्वतंत्र है, इसीलिए वह कर्ता है। पाणिनि ने ठीक ही कहा है 'स्वतंत्रः कर्ता' जो स्वतंत्र होता है, वही कर्ता होता है। स्वातंत्र्य और कर्तृत्व प्रायः एक ही अर्थ के बोधक हैं। शान्तब्रह्मवाद के अनुसार ब्रह्म बिलकुल शान्त है, निष्क्रिय है। जब ब्रह्म अविद्या से उपहित हो जाता है, तब वह ईश्वर कहलाता है और तभी उसमें कर्तृत्व आता है। वास्तविक कर्तृत्व अविद्या का है। ईश्वर जब अविद्या से अनुपहित रहता है, तब उसमें कोई कर्तृत्व नहीं रहता। शंकर स्पष्ट रूप से कहते हैं "तदेवमविद्यात्मकोपाधिपरिच्छेदापेक्षमेश्वरस्येश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं सर्व- शक्तित्वं च, न परमार्थतो विद्यायापास्तसर्वोपाधिस्वरूपे आत्मनीशित्रीशितव्य- त्वादि व्यवहार उपपद्यते"। (२-१-१४) अर्थात् ईश्वर का ईश्वरत्व, सर्वज्ञत्व और सर्वशक्तित्व उसकी अविद्या उपाधि-जन्य परिमितता पर अवलम्बित है। परमार्थ में जब विद्या के द्वारा आत्मा में से सभी उपाधियां निरस्त हो जाती हैं तब उसके लिए ईशितृ, ईशितव्य, सर्वज्ञत्व आदि व्यवहार उपयुक्त नहीं हो सकता। तो शंकर के अनुसार ईश्वर में जो कुछ कर्तृत्व है, वह अविद्या के कारण है। इसके विपरीत, ईश्वराद्वयवाद के अनुसार ज्ञातृत्व और कर्तृत्व परमेश्वर का स्वरूप ही है। कृतृत्व के बिना परमेश्वर की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इस दर्शन में शांकर वेदान्त के समान कृतृत्व ईश्वर की उपाधि नहीं है, प्रत्युत उसका स्वरूप ही है। संक्षेपतः उसके कृतृत्व को हम उसके पंचकृत्य में संगृहीत कर सकते हैं। वह पंचकृत्य है सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह। उसका यह पंचकृत्य सदा चलता रहता है। जब वह जीव का रूप धारण करता है तब भी उसका उपर्युक्त पंचकृत्व बराबर चलता रहता है। ईश्वराद्वयवाद के अनुसार शिव सदा पंचकृत्यकारी है। शांकर वेदान्त के अनुसार ब्रह्म निष्क्रिय है। महेश्वरानन्द का कहना है कि निष्क्रिय ब्रह्म तो असत् के समान हो जायगा। "तथाहि परमेश्वरस्य ह्ययमेवासाधारणस्वभावो

( २३ )

यत् सर्वदा सृष्ट्यादिपंचकृत्यकारित्वम्। एतदनंगीकाराद्धिमायावेदान्तादिनि- र्णीतस्यात्मनः स्वस्फुरणामोदमान्द्यलक्षणमसत्कल्पत्वापतितम्" । (म० मं० पृ० ५२) अर्थात् परमेश्वर का यही असाधारण स्वभाव है कि वह सदा सृष्टि इत्यादि पंचकृत्य करता रहता है । यदि यह स्वीकार न किया जाय तो माया- वेदान्तादि द्वारा निर्णीत आत्मा अपने स्फुरण का पता न होने से असत् के समान हो जायगा । ईश्वराद्वयवाद भी अविद्या और माया को मानता है, किन्तु उसके अनु- सार अविद्या या माया कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो ईश्वर को ग्रस्त कर लेती है, प्रत्युत वह अपने स्वातंत्र्य द्वारा, अपनी ही शक्ति द्वारा, अपनेही द्वारा आरोपित आत्मसंकोच है । शंकर के अनुसार ब्रह्म सर्वथा निष्क्रिय है, जो कुछ कर्तृत्व है वह सब अविद्या अथवा तज्जन्य माया का है। ईश्वराद्वयवाद के अनुसार सब कर्तृत्वईश्वर का है, माया भी उसी के कर्तृत्व का एक प्ररूप है । शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार माया अनिर्वचनीय है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद के अनुसार माया शिव की शक्ति होने के कारण यथार्थ है और नानात्व और भेद-दृष्टि उत्पन्न करती है । शान्तब्रह्मवाद के अनुसार जगत् मिथ्या है, किन्तु ईश्वराद्वयवाद के अनुसार जगत् सत्य है, वह ईश्वर की शक्ति का विलास है। यतःशक्ति यथार्थ है, अतः शक्ति द्वारा घटित विश्व भी यथार्थ है। शंकर माया को सत् और असत् दोनों से अनिर्वचनीय मानते हैं ( सदसद्भ्यामनिर्वचनीया ), अतः उनका अद्वैतवाद व्यावृत्तिमूलक (exclusive) है, अनुवृत्तिमूलक (all inclusive) नहीं है । ईश्वराद्वयवाद माया को शिवमयी (शिव का ही प्ररूप) मानता है। अतः शैव अद्वैतवाद पूर्ण है, सर्वसंग्राही और अनुवृत्तिमूलक है। जैसा कि शंकर मानते हैं कि ब्रह्म सत्य है और माया अन्ततोगत्वा असत्य है, यदि यह शंकर वेदान्त का आधारभूत मत है तो उनके दर्शन में द्वैताभास अनिवार्य हो जायगा । शंकर के विवर्तवाद के अनुसार जगत् में जो कुछ है वह सब नामरूप है और वस्तुतः सत्य नहीं समझा जा सकता। ईश्वराद्वयवाद के अनुसार, आभास परमशिव की कल्पना या अनुभव होने के कारण सत्य हैं। यद्यपि वे परमशिव में उसी रूप में नहीं रहते जिस रूप में परिमित प्रमाता या जीव उनका अनु- भव करते हैं, तथापि वे परमशिव के अनुभव या कल्पना के रूप में उसमें विद्यमान रहते हैं। इसलिए वे वस्तुतः यथार्थ हैं। जो परमशिव का अनुभव या प्रत्ययन है वह असत्य नहीं हो सकता ।

[Page-header] ( २४ )

ईश्वराद्वयवाद के अनुसार जीव की अवस्था में भी शिव या आत्मा का पंचकृत्य चलता रहता है । शान्तब्रह्मवाद के अनुसार जीव में भी आत्मा निष्क्रिय रहता है, जो कुछ क्रिया होती है वह बुद्धि की होती है । शंकर के अनुसार मुक्ति में जगत् निरस्त हो जाता है, शैवदर्शन के अनुसार मुक्ति में जगत् शिवचेतना के स्फुरण या आत्म चेतना के चमत्कार के रूप में प्रतीत होता है । संक्षेप में हम दोनों दर्शनों के मत को एक सारणी में इस प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं :

शान्तब्रह्मवाद | ईश्वराद्वयवाद १-चित् या ब्रह्म या प्रकाश ज्ञान मात्र है । चित् निष्क्रिय है । | चित् प्रकाश और विमर्शमय है । | अतः उसमें ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों | हैं । उसमें पंचकृत्य होता रहता है । २-क्रिया अविद्या या माया का कार्य है । माया या अविद्या से | महेश्वर में स्वातन्त्र्य है । इस- उपहित होने पर ही ईश्वर क्रियावान् होता है । | लिए उसमें कर्तृत्व है । माया महेश्वर | से कोई पृथक् वस्तु नहीं है जिससे | वह उपहित हो जाता है । माया | महेश्वर की ही शक्ति है जिसके द्वारा | नानात्व और भेद घटित होते हैं । ३-माया अनिर्वचनीय है । | माया महेश्वर की शक्ति होने के | कारण सत्य है । ४-माया अनिर्वचनीय होने के कारण ईश्वर से असंहत या शिथिल | माया शिवमयी या चिन्मयी है । रूप से सम्बद्ध है और अन्ततोगत्वा असत्य है । माया कुछ पृथक् तत्व | वह शिव की निजी शक्ति है । वह जैसी लगती है । अतः शंकर का अद्वैतवाद व्याववृत्तिमूलक है । | पृथक् तत्व नहीं है । इसलिए शैव | अद्वैतवाद सर्वसंग्राही और पूर्ण है । | जीव दशा में भी शिव का पंचकृत्य | कभी बन्द नहीं होता । ६-जगत् मिथ्या है । विश्व केवल नामरूप है, अतः वह वस्तुतः | विश्व शिवरूप है, अतः सत्य है । सत्य नहीं है । | यह महेश्वर का वैभव है । आभास | शिव की परिकल्पना हैं, इस लिए वे | असत्य नहीं हो सकते । ५-जीव दशा में भी आत्मा निष्क्रिय है । क्रिया केवल बुद्धि में है । | जीव दशा में भी शिव का पंच- | कृत्य कभी बन्द नहीं होगा ।

( २५ ) शान्तब्रह्मवाद ईश्वराद्वयवाद ७—मोक्षावस्था में विश्व निरस्त मोक्षावस्था में विश्व शिव-चेतना हो जाता है । या अकृत्रिम अहं-चेतना के रूप में प्रतीत होता है । ८—शांकर वेदान्त के अनुसार अद्वैत शैववाद के अनुसार अविद्या अविद्या विद्या के द्वारा निरस्त हो या अज्ञान दो प्रकार का है-बौद्ध जाती है, तब मुक्तिलाभ होता है। अज्ञान और पौरुष अज्ञान । बौद्ध विद्या प्राप्त होती है श्रवण, मनन अज्ञान बुद्धिगत है । पौरुष अज्ञान और निदिध्यासन द्वारा । स्वरूपगत है । विद्या से केवल बौद्ध अज्ञान निरस्त होगा । पौरुष अज्ञान फिर भी शेष रह जायगा । ऐसा व्यक्ति कोरी शून्यावस्था में पतित होगा । उसे शिवत्वलाभ नहीं हो सकता । पौरुष अज्ञान का भी निरसन आवश्यक है । पौरुष अज्ञान केवल शक्तिपात द्वारा ही अपसारित हो सकता है । शक्तिपात या तो सिद्ध गुरु के द्वारा या साक्षात् भगवदनुग्रह के द्वारा हो सकता है । ६-जीव :- इस दर्शन के अनुसार जीव मन और शरीर का पुतला मात्र नहीं है । वह कुछ और भी है । उसका शरीर पञ्च महाभूतों का बना होता है । इसे स्थूल शरीर कहते हैं । उसके भीतर मन बुद्धि और अहंकार युक्त एक अन्त- करण भी होता है । मन, बुद्धि, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ इन आठ के समुदाय को 'पुर्यष्टक' कहते हैं । यह सूक्ष्मशरीर है । मृत्यु के समय जीव इसी सूक्ष्मशरीर में रहता हुआ स्थूलशरीर को छोड़ता है । उसके भीतर प्राणशक्ति भी होती है । यह ईश्वरीय शक्ति है जो विश्व और जीव दोनों में काम करती रहती है । मानव के भीतर कुण्डलिनी शक्ति भी है जो उसमें सुप्तावस्था में रहती है ।

( २६ ) सब का केन्द्रभूत शिव या चैतन्य है जो कि उसका आत्मा है । यद्यपि वस्तुतः उसका आत्मा शिव ही है, तथापि वह आणव मल के कारण परि- सीमित या अणु के रूप में उसमें रहता है । ७-बन्ध :- जीवन का बन्ध जन्मजात अख्याति या अविद्या के कारण है जिसे आणव मल कहते हैं । यह मल वह आद्य अवच्छेदक उपबन्ध है जिसके द्वारा सर्व- व्यापी चैतन्य एक अणु या परिसीमित दशा में आ जाता है। यह दशा महेश्वर की इच्छाशक्ति के संकोच से होती है । इसी के कारण जीव अपने को सर्वव्यापी चैतन्य से भिन्न एक पृथक् व्यक्ति समझने लगता है । यह आत्म- परिच्छेद की चेतना है। ८-मोक्ष :- इस दर्शन में मोक्ष का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा । दूसरे शब्दों में अकृत्रिम अहं - विमर्श का उदय मोक्ष है । अकृत्रिम अहं विमर्श क्या है यह उत्पलदेव के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट हो जायगा । "अहं प्रत्यवमर्शो विमर्शात्मापि वाग्वपुः । नासौ विकल्पः, स ह्युक्तो द्वयापेक्षी विनिश्चयः ।" ( ई० प्र० ६ आ० १ ) शुद्ध अहंविमर्श विकल्प नहीं है, क्योंकि विकल्प द्वयापेक्षी या सापेक्ष होता है । साधारणतः अहंविमर्श या आत्म-बोध अनात्म की विपरीतता की अपेक्षा से होता है । शुद्ध अहं-विमर्श इस प्रकार सापेक्ष नहीं होता । वह एक अव्यवहित अपरोक्षानुभूति है । जब इस प्रकार की अनुभूति होती है तभी अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है । यही वास्तविक स्वरूप का बोध ही मोक्ष है । जैसा कि अभिनवगुप्त ने कहा है :- "मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि तत्" ( तं० आ० १, पृ० १६२ ) मोक्ष और कुछ नहीं है, केवल अपने स्वरूप का उन्मेष ही मोक्ष है । वास्तविक शुद्ध अहं-विमर्श से चिदानन्द का लाभ होता है । चित्त ही अब चित् या चिति में परिणत हो जाता है । ( दे० प्र० हृ० सूत्र १३ ) शुद्ध अहं-विमर्श के लाभ होने से शिव-चेतना का उदय होता है जिसमें सारा विश्व शिवमय या शुद्ध अहंमय प्रतीत होता है ।

( २७ ) इस दर्शन के अनुसार सर्वोच्च आनन्द जगदानन्द है जिसमें सारा विश्व चित् या शिव प्रतीत होता है। यह मोक्ष तर्क छांटने या बौद्धिक आतिशबाजी से नहीं प्राप्त हो सकता। यह शक्तिपात या अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। शक्तिपात या अनुग्रह :— जो जीव पूर्वजन्म के संस्कार से उन्नत अवस्था को पहुँचे हुए हैं वे तीव्र शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। वे बिना किसी विशेष साधना के मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो जीव उनसे कम विकसित होते हैं वे मध्यम शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। इस शक्तिपात से वे गुरु की खोज करते हैं और उनसे दीक्षा प्राप्त कर साधना करते हैं। उचित समय में वे मुक्त हो जाते हैं। वे जीव जो उनसे भी कम विकसित होते हैं मन्द शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। इससे उनमें आध्यात्मिक ज्ञान और साधना के लिए उत्कण्ठा जाग्रत् होती है और वे भी समय आने पर मोक्ष प्राप्त करते हैं। उपाय :— अनुग्रह यों ही नहीं हो जाया करता। यह नैतिक और आध्यात्मिक साधना द्वारा अर्जित किया जाता है। अनुग्रह अर्जन करने के चार मुख्य उपाय हैं :— अनुपाय, शाम्भवोपाय शाक्तोपाय और आणवोपाय। ये उपाय मल को निरस्त करने के लिए हैं जिनसे साधक अनुग्रह की प्राप्ति के योग्य बनता है। १—अनुपाय :— अनुपाय को शब्दतः उपाय कहना कठिन है। यह सर्वथा अनुग्रह पर आश्रित है। गुरु के एक शब्द से शक्तिपात हो सकता है और साधक को ऐसा प्रकाश मिल सकता है जिससे क्षण भर में उसे आत्मसाक्षात्कार हो जाय। अथवा प्रभु के अनुग्रह का उस पर सीधे बौछार हो सकता है जिससे उसे तत्काल आत्मसाक्षात्कार हो जाता है। अनुपाय में जो अन् उपसर्ग है उसका ईषत् अर्थात् अत्यन्त अल्प भी अर्थ होता है। इस अर्थ के अनुसार अनुपाय का भाव है साधक के द्वारा अत्यन्त अल्प अथवा नाम मात्र का प्रयत्न। दोनों ही अर्थों में अनुपाय का भाव है तीव्रतम शक्तिपात के द्वारा साक्षात्कार। कभी कभी एक सिद्ध पुरुष के दर्शन मात्र से साधक को प्रकाश मिल जाता है और वह रूपान्तरित हो जाता है।

( २८ )

अनुपाय साधारणतः आनन्दोपाय कहा जाता है । आणवोपाय वह उपाय है जिसमें साधक अपने करणों का आत्मसाक्षा- त्कार के लिए उपयोग करता है । इसमें प्राणायाम, इष्टदेव की पूजा इत्यादि साधनों का प्रयोग होता है । अन्ततः मध्यधाम या सुषुम्ना के उन्मीलन से आत्मसाक्षात्कार होता है । इसको क्रियोपाय भी कहते हैं क्योंकि क्रिया, जैसे किसी मंत्र का जप, पूजा इत्यादि, इस साधना का प्रधान अंग है । इसे भेदो- पाय भी कहते हैं क्योंकि भेद के आधार पर यह साधना प्रतिष्ठित है । शाक्तोपाय उन मानसिक साधनों पर प्रतिष्ठित है जिनसे उन आन्तरिक शक्तियों का विकास होता है जिनके द्वारा साधक समावेश लाभ करता है । इस उपाय में विशेष कर मंत्रशक्ति का उपयोग होता है जिससे साधक को प्रातिभ ज्ञान हो जाता है । क्रमशः उसका द्वैतभाव कम होने लगता है और उसकी चेतना परासंविद् में निमग्न हो जाती है । इस साधना में "मैं शिवहूँ", 'विश्व मेरे आत्मा का प्रसर है"--इस प्रकार की भावना करनी पड़ती है । आणवोपाय में इन्द्रियां, प्राण और मन की साधना करनी पड़ती है । शाक्तोपाय मुख्यतः मन की साधना है । शाक्तोपाय को ज्ञानोपाय भी कहते हैं, क्योंकि मानसिक साधना इसका मुख्य अंग है । इसको भेदाभेदोपाय भी कहते हैं क्योंकि इसमें भेदबुद्धि और तादात्म्यबुद्धि दोनों का प्रयोग है । इस उपाय से, बिना विशेष प्रयास के कुण्डलिनी जाग्रत् होकर मूलाधार से ऊपर की ओर उठती है और आत्मसाक्षात्कार सम्पन्न कर देती है । शाम्भवोपाय प्रौढ़ और उन्नत साधकों के लिए है जो शिवतत्व का निदि- ध्यासन करने से शिव-चेतना-युक्त हो जाते हैं । यह एक अनवरत अभिज्ञता और जागरूकता का मार्ग है । साधक पहले पंचकृत्य पर मनन करता है, फिर विकल्पक्षय की साधना करता है और इस विचार पर मनन करने का अभ्यास करता है कि विश्व केवल चित् का प्रतिफलन है । अन्त में वह इन साध- नाओं का भी त्याग कर देता है और शुद्ध, अकृत्रिम अहं-विमर्श को प्राप्त करता है । क्षेमराज का कहना है कि मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है । उपर्युक्त तीनों उपायों की दृष्टि से मध्य का अलग अलग भाव है । आणवोपाय की दृष्टि से मध्य सुषुम्ना नाड़ी है जिसका विकास करना है । शाक्तोपाय की दृष्टि से मध्य परासंविद् है जिसे प्राप्त करना है । शाम्भवोपाय

( २६ )

की दृष्टि से मध्य शुद्ध, अकृत्रिम अहं है जो कि सब कुछ का मध्य या केन्द्र है । उपर्युक्त उपायों से मध्य को ही प्राप्त करना है । मध्य के विकास के लिए क्षेमराज ने विकल्पक्षय, शक्तिसंकोच, शक्तिविकास वाह्यच्छेद और आद्यन्तकोटि के अभ्यास की अनुशंसा की है। (दे० सू० १८) इनमें से विकल्प-क्षय शाम्भवोपाय है, शक्तिसंकोच, शक्ति-विकास शाक्तोपाय है और वाह्यच्छेद और आद्यन्तकोटिनिभालन आणवोपाय है । प्रत्यभिज्ञादर्शन पंचकृत्य के मनन और विकल्पक्षय के अभ्यास को अत्यन्त गुरुत्व प्रदान करता है । इसका मत है कि शिव का पंचकृत्य, सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह-जीव में भी सदा चलता रहता है । साधक को उच्च चेतना को प्राप्त करने के लिए पंचकृत्य के गुह्य भाव पर सदा मनन करना चाहिए । जीव नियतदेशकालादि में नील इत्यादि का जो प्रत्यक्ष करता है वह सृष्टि है । नीलादि आभास का नैरन्तर्य स्थिति है । अहं भाव के आनन्द-विमर्शन के समय उस आभास का संहार है । जब संहृत होने पर भी संस्कारवश से उसका आभास होने लगता है, तब विलय की दशा है । जब हठपाक क्रम से वह चित् में विलीन हो जाता है, तब अनुग्रह की दशा है (दे० सूत्र ११) । इस अभ्यास से साधक शुद्ध चिदानन्द का अधिकारी हो जाता है । एक अन्य विधि विकल्प-क्षय की है । चित्त नाना प्रकार की वृत्तियों का आखेट-स्थल है जो कि एक दूसरे के बाद समुद्र पर लहर के समान उठती रहती हैं ! हम इन्हीं वृत्तियों में उलझे रहते हैं । उनके पीछे शान्त चेतना का जो स्तर है उसका हमको पता भी नहीं होता । विकल्पक्षय का अभ्यास क्षोभ से मुक्त होने और उस अधःस्थ चेतना की प्राप्ति के लिए बतलाया गया है जिसके ऊपरी तल पर विकल्प विहार करते रहते हैं । यह उपलब्धि हठात् नहीं हो सकती, क्योंकि वृत्तियों के हठपूर्वक निरोध से केवल प्रतिरोध खड़ा होता है । यह स्थिति केवल सावधान निश्चेष्टता द्वारा, अकिंचिच्चिन्तकत्व सहित सावधानता द्वारा प्राप्त हो सकती है । इन साधनाओं के द्वारा समावेश की प्राप्ति होती है ! इस समावेश को समग्र और परिपूर्ण और स्थायी करने के लिए क्रममुद्रा की साधना करनी पड़ती है । क्रममुद्रा द्वारा जीव की चेतना का सर्वव्यापी चेतना से तादात्म्य के अनुभव को जगत् के अनुभव में भी समन्वित करना पड़ता है । यह दर्शन उस समावेश को परिपूर्ण नहीं मानता जो केवल समाधि की अवस्था में रहता

( ३० ) है और व्युत्थान में लुप्त हो जाता है। इस दर्शन की धारणा यह है कि वही पूर्ण समावेश है जो व्युत्थानदशा में भी अविचलित रहता है और जिसके द्वारा जगत् केवल मृण्मय नहीं प्रतीत होता, प्रत्युत दिव्यप्रकाश के परिधान से सम- लंकृत दीख पड़ता है। वह सर्वव्यापी चेतना की अभिव्यक्ति और विलास प्रतीत होता है और स्वयं साधक भी यही अनुभव करता है कि मैं भी वही चेतना हूँ। तब जगत् परिहार का विषय नहीं रह जाता प्रत्युत आनन्द का विषय (जगदानन्द) बन जाता है। तब वास्तविक अकृत्रिम अहं-विमर्शका उदय होता है जिसमें जगत् प्रतियोगी की भांति नहीं प्रत्युत अहं की अभिव्यक्ति की भांति प्रतीत होता है । इस दर्शन में जीवनमुक्ति की यही अवधारणा है। जगत् का उदय शिव के शुद्ध अहंविमर्श से होता है। मानव की अवस्था में उस अहंविमर्श का तादात्म्य अन्न-प्राण-मनोमयकोशों से हो जाता है और जगत् उस अहं का सर्वथा प्रतियोगी प्रतीत होता है। मानव का कर्त्तव्य है पुनः उस अहंविमर्श को प्राप्त करना जिसमें अहं और इदं एक ही है। निस्सन्देह यह अवस्था एकाएक नहीं प्राप्त हो सकती। इस दर्शन के अनुसार प्रमाताओं का उच्चावच स्तर है। विवर्तन प्रक्रिया में मानव क्रमशः मायाप्रमाता की अवस्था से ऊपर उठते हुए शिव के शुद्ध अहं-विमर्श की अवस्था को पहुँच जाता है। सामान्य जीव सकल कहलाता है। उसमें कार्म, मायीय और आणव तीनों मल होते हैं। कई जन्मों के अनन्तर जिसमें कि वह भौतिक और मानसिक शक्तियों के वशीभूत होकर नाना प्रकार के कृत्य करता रहता है, वह एक मानसिक व्यथा से ग्रस्त हो उठता है जिसके कारण वह जीवन का 'कहांसे' और 'किधर' जानने का चेष्टा करता है। यह शिव के अनुग्रह की प्रथम अभिव्यक्ति है। यदि वह पर्याप्त रूप से सावधान नहीं रहता और अवाञ्छनीय प्रकार के योग का अभ्यास करता है, तो वह प्रलयाकल हो जा सकता है। प्रलया- कल कार्ममल से मुक्त होता है। उसमें केवल मायीय और आणव मल होता है, किन्तु उसमें न ज्ञान होता है न क्रिया। यह वाञ्छनीय अवस्था नहीं है। प्रलय के समय तो प्रत्येक सकल 'प्रलयाकल' हो जाता है। विज्ञानाकल एक अधिक उच्च अवस्था का साधक है। वह माया से ऊपर उठ गया है, किन्तु शुद्ध विद्या के नीचे है। वह कार्म और मायीयमल से मुक्त

( ३१ ) है, किन्तु अभी उसमें आणव मल विद्यमान है। उसमें ज्ञान और इच्छा होती है, किन्तु क्रिया नहीं होती । विज्ञानाकल के ऊपर मंत्र, मंत्रेश्वर, मंत्रमहेश्वर और शिवप्रमाता होते हैं जिनमें उत्तरोत्तर उत्कर्ष होता है। ये सभी मलों से मुक्त होते हैं, किन्तु इनमें एकत्वचेतना का न्यूनाधिक मात्रा में अनुभव रहता है। (विशेष विवरण के लिए टि० सं० ३६ में दी हुई सारणी देखिए) केवल शिवप्रमाता को प्रत्येक वस्तु शिव ही प्रतीत होती है । शुद्ध अहं-चेतना अथवा विमर्श ही सारी सृष्टि-प्रक्रिया का मूल अथवा उद्गम स्थल है। शिव की शुद्ध अहं-चेतना ही से निमेष अथवा तिरोभाव प्रारम्भ होता है। उन्मेष अथवा आविर्भाव पुनः उसी शुद्ध अहं-चेतना की ओर पहुँचता है । अब जीवन-पथिक स्वदेश को लौट आता है, किन्तु मार्ग में शिव के अद्भुत वैभव के अनुभव से समृद्ध होकर । एक एक करके आव- रण हटता जाता है और अन्ततः वह परमतत्त्व के हृदय में स्थित हो जाता है। अब उसके मुख से अभिनवगुप्त के शब्दों में यह उद्गार निकल पड़ता है स्वतंत्रः स्वच्छातमा स्फुरति सततं चेतसि शिवः पराशक्तिश्चेयं करणसरणिप्रान्तमुदिता । तदा भोगात्मा स्फुरति च समस्तं जगदिदम् न जाने कुत्राथं ध्वनिरनुपतेत् संसृतिरिति ॥ (महेश्वरानन्द द्वारा महार्थमंजरी में उद्धृत, पृ० २५) "स्वातंत्र्य से परिपूर्ण स्वच्छस्वरूप शिव ही मेरी चेतना में सदा स्फुरित होता रहता है। परा शक्ति ही मेरे इन्द्रियों के प्रान्त में क्रीड़ा करती रहती है । तो फिर यह समस्त जगत् शुद्ध अहं-चेतना के चमत्कार से स्फुरित होता रहता है। न जाने कहां से संस्कृति (संसार) की ध्वनि मेरे कानों पर पड़ती है।"

इस पृष्ठ पर कोई सीधा (अग्रभाग का) पाठ्य मुद्रित नहीं है; यह एक रिक्त पृष्ठ (blank page/verso) है जिस पर केवल पृष्ठ के दूसरी ओर (पृष्ठ संख्या १६) का उलटा (दर्पण-प्रतिबिम्बित / bleed-through) प्रतिरूप दिखाई दे रहा है।