प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६ ) सब का केन्द्रभूत शिव या चैतन्य है जो कि उसका आत्मा है । यद्यपि वस्तुतः उसका आत्मा शिव ही है, तथापि वह आणव मल के कारण परि- सीमित या अणु के रूप में उसमें रहता है । ७-बन्ध :- जीवन का बन्ध जन्मजात अख्याति या अविद्या के कारण है जिसे आणव मल कहते हैं । यह मल वह आद्य अवच्छेदक उपबन्ध है जिसके द्वारा सर्व- व्यापी चैतन्य एक अणु या परिसीमित दशा में आ जाता है। यह दशा महेश्वर की इच्छाशक्ति के संकोच से होती है । इसी के कारण जीव अपने को सर्वव्यापी चैतन्य से भिन्न एक पृथक् व्यक्ति समझने लगता है । यह आत्म- परिच्छेद की चेतना है। ८-मोक्ष :- इस दर्शन में मोक्ष का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा । दूसरे शब्दों में अकृत्रिम अहं - विमर्श का उदय मोक्ष है । अकृत्रिम अहं विमर्श क्या है यह उत्पलदेव के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट हो जायगा । "अहं प्रत्यवमर्शो विमर्शात्मापि वाग्वपुः । नासौ विकल्पः, स ह्युक्तो द्वयापेक्षी विनिश्चयः ।" ( ई० प्र० ६ आ० १ ) शुद्ध अहंविमर्श विकल्प नहीं है, क्योंकि विकल्प द्वयापेक्षी या सापेक्ष होता है । साधारणतः अहंविमर्श या आत्म-बोध अनात्म की विपरीतता की अपेक्षा से होता है । शुद्ध अहं-विमर्श इस प्रकार सापेक्ष नहीं होता । वह एक अव्यवहित अपरोक्षानुभूति है । जब इस प्रकार की अनुभूति होती है तभी अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है । यही वास्तविक स्वरूप का बोध ही मोक्ष है । जैसा कि अभिनवगुप्त ने कहा है :- "मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि तत्" ( तं० आ० १, पृ० १६२ ) मोक्ष और कुछ नहीं है, केवल अपने स्वरूप का उन्मेष ही मोक्ष है । वास्तविक शुद्ध अहं-विमर्श से चिदानन्द का लाभ होता है । चित्त ही अब चित् या चिति में परिणत हो जाता है । ( दे० प्र० हृ० सूत्र १३ ) शुद्ध अहं-विमर्श के लाभ होने से शिव-चेतना का उदय होता है जिसमें सारा विश्व शिवमय या शुद्ध अहंमय प्रतीत होता है ।