प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
पृष्ठ 37, कुल 187 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७ ) इस दर्शन के अनुसार सर्वोच्च आनन्द जगदानन्द है जिसमें सारा विश्व चित् या शिव प्रतीत होता है। यह मोक्ष तर्क छांटने या बौद्धिक आतिशबाजी से नहीं प्राप्त हो सकता। यह शक्तिपात या अनुग्रह से ही प्राप्त होता है। शक्तिपात या अनुग्रह :— जो जीव पूर्वजन्म के संस्कार से उन्नत अवस्था को पहुँचे हुए हैं वे तीव्र शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। वे बिना किसी विशेष साधना के मोक्ष प्राप्त करते हैं। जो जीव उनसे कम विकसित होते हैं वे मध्यम शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। इस शक्तिपात से वे गुरु की खोज करते हैं और उनसे दीक्षा प्राप्त कर साधना करते हैं। उचित समय में वे मुक्त हो जाते हैं। वे जीव जो उनसे भी कम विकसित होते हैं मन्द शक्तिपात के अधिकारी होते हैं। इससे उनमें आध्यात्मिक ज्ञान और साधना के लिए उत्कण्ठा जाग्रत् होती है और वे भी समय आने पर मोक्ष प्राप्त करते हैं। उपाय :— अनुग्रह यों ही नहीं हो जाया करता। यह नैतिक और आध्यात्मिक साधना द्वारा अर्जित किया जाता है। अनुग्रह अर्जन करने के चार मुख्य उपाय हैं :— अनुपाय, शाम्भवोपाय शाक्तोपाय और आणवोपाय। ये उपाय मल को निरस्त करने के लिए हैं जिनसे साधक अनुग्रह की प्राप्ति के योग्य बनता है। १—अनुपाय :— अनुपाय को शब्दतः उपाय कहना कठिन है। यह सर्वथा अनुग्रह पर आश्रित है। गुरु के एक शब्द से शक्तिपात हो सकता है और साधक को ऐसा प्रकाश मिल सकता है जिससे क्षण भर में उसे आत्मसाक्षात्कार हो जाय। अथवा प्रभु के अनुग्रह का उस पर सीधे बौछार हो सकता है जिससे उसे तत्काल आत्मसाक्षात्कार हो जाता है। अनुपाय में जो अन् उपसर्ग है उसका ईषत् अर्थात् अत्यन्त अल्प भी अर्थ होता है। इस अर्थ के अनुसार अनुपाय का भाव है साधक के द्वारा अत्यन्त अल्प अथवा नाम मात्र का प्रयत्न। दोनों ही अर्थों में अनुपाय का भाव है तीव्रतम शक्तिपात के द्वारा साक्षात्कार। कभी कभी एक सिद्ध पुरुष के दर्शन मात्र से साधक को प्रकाश मिल जाता है और वह रूपान्तरित हो जाता है।