प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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अनुपाय साधारणतः आनन्दोपाय कहा जाता है । आणवोपाय वह उपाय है जिसमें साधक अपने करणों का आत्मसाक्षा- त्कार के लिए उपयोग करता है । इसमें प्राणायाम, इष्टदेव की पूजा इत्यादि साधनों का प्रयोग होता है । अन्ततः मध्यधाम या सुषुम्ना के उन्मीलन से आत्मसाक्षात्कार होता है । इसको क्रियोपाय भी कहते हैं क्योंकि क्रिया, जैसे किसी मंत्र का जप, पूजा इत्यादि, इस साधना का प्रधान अंग है । इसे भेदो- पाय भी कहते हैं क्योंकि भेद के आधार पर यह साधना प्रतिष्ठित है । शाक्तोपाय उन मानसिक साधनों पर प्रतिष्ठित है जिनसे उन आन्तरिक शक्तियों का विकास होता है जिनके द्वारा साधक समावेश लाभ करता है । इस उपाय में विशेष कर मंत्रशक्ति का उपयोग होता है जिससे साधक को प्रातिभ ज्ञान हो जाता है । क्रमशः उसका द्वैतभाव कम होने लगता है और उसकी चेतना परासंविद् में निमग्न हो जाती है । इस साधना में "मैं शिवहूँ", 'विश्व मेरे आत्मा का प्रसर है"--इस प्रकार की भावना करनी पड़ती है । आणवोपाय में इन्द्रियां, प्राण और मन की साधना करनी पड़ती है । शाक्तोपाय मुख्यतः मन की साधना है । शाक्तोपाय को ज्ञानोपाय भी कहते हैं, क्योंकि मानसिक साधना इसका मुख्य अंग है । इसको भेदाभेदोपाय भी कहते हैं क्योंकि इसमें भेदबुद्धि और तादात्म्यबुद्धि दोनों का प्रयोग है । इस उपाय से, बिना विशेष प्रयास के कुण्डलिनी जाग्रत् होकर मूलाधार से ऊपर की ओर उठती है और आत्मसाक्षात्कार सम्पन्न कर देती है । शाम्भवोपाय प्रौढ़ और उन्नत साधकों के लिए है जो शिवतत्व का निदि- ध्यासन करने से शिव-चेतना-युक्त हो जाते हैं । यह एक अनवरत अभिज्ञता और जागरूकता का मार्ग है । साधक पहले पंचकृत्य पर मनन करता है, फिर विकल्पक्षय की साधना करता है और इस विचार पर मनन करने का अभ्यास करता है कि विश्व केवल चित् का प्रतिफलन है । अन्त में वह इन साध- नाओं का भी त्याग कर देता है और शुद्ध, अकृत्रिम अहं-विमर्श को प्राप्त करता है । क्षेमराज का कहना है कि मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है । उपर्युक्त तीनों उपायों की दृष्टि से मध्य का अलग अलग भाव है । आणवोपाय की दृष्टि से मध्य सुषुम्ना नाड़ी है जिसका विकास करना है । शाक्तोपाय की दृष्टि से मध्य परासंविद् है जिसे प्राप्त करना है । शाम्भवोपाय