प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५ ) शान्तब्रह्मवाद ईश्वराद्वयवाद ७—मोक्षावस्था में विश्व निरस्त मोक्षावस्था में विश्व शिव-चेतना हो जाता है । या अकृत्रिम अहं-चेतना के रूप में प्रतीत होता है । ८—शांकर वेदान्त के अनुसार अद्वैत शैववाद के अनुसार अविद्या अविद्या विद्या के द्वारा निरस्त हो या अज्ञान दो प्रकार का है-बौद्ध जाती है, तब मुक्तिलाभ होता है। अज्ञान और पौरुष अज्ञान । बौद्ध विद्या प्राप्त होती है श्रवण, मनन अज्ञान बुद्धिगत है । पौरुष अज्ञान और निदिध्यासन द्वारा । स्वरूपगत है । विद्या से केवल बौद्ध अज्ञान निरस्त होगा । पौरुष अज्ञान फिर भी शेष रह जायगा । ऐसा व्यक्ति कोरी शून्यावस्था में पतित होगा । उसे शिवत्वलाभ नहीं हो सकता । पौरुष अज्ञान का भी निरसन आवश्यक है । पौरुष अज्ञान केवल शक्तिपात द्वारा ही अपसारित हो सकता है । शक्तिपात या तो सिद्ध गुरु के द्वारा या साक्षात् भगवदनुग्रह के द्वारा हो सकता है । ६-जीव :- इस दर्शन के अनुसार जीव मन और शरीर का पुतला मात्र नहीं है । वह कुछ और भी है । उसका शरीर पञ्च महाभूतों का बना होता है । इसे स्थूल शरीर कहते हैं । उसके भीतर मन बुद्धि और अहंकार युक्त एक अन्त- करण भी होता है । मन, बुद्धि, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ इन आठ के समुदाय को 'पुर्यष्टक' कहते हैं । यह सूक्ष्मशरीर है । मृत्यु के समय जीव इसी सूक्ष्मशरीर में रहता हुआ स्थूलशरीर को छोड़ता है । उसके भीतर प्राणशक्ति भी होती है । यह ईश्वरीय शक्ति है जो विश्व और जीव दोनों में काम करती रहती है । मानव के भीतर कुण्डलिनी शक्ति भी है जो उसमें सुप्तावस्था में रहती है ।