प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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ईश्वराद्वयवाद के अनुसार जीव की अवस्था में भी शिव या आत्मा का पंचकृत्य चलता रहता है । शान्तब्रह्मवाद के अनुसार जीव में भी आत्मा निष्क्रिय रहता है, जो कुछ क्रिया होती है वह बुद्धि की होती है । शंकर के अनुसार मुक्ति में जगत् निरस्त हो जाता है, शैवदर्शन के अनुसार मुक्ति में जगत् शिवचेतना के स्फुरण या आत्म चेतना के चमत्कार के रूप में प्रतीत होता है । संक्षेप में हम दोनों दर्शनों के मत को एक सारणी में इस प्रकार प्रदर्शित कर सकते हैं :
शान्तब्रह्मवाद | ईश्वराद्वयवाद १-चित् या ब्रह्म या प्रकाश ज्ञान मात्र है । चित् निष्क्रिय है । | चित् प्रकाश और विमर्शमय है । | अतः उसमें ज्ञातृत्व और कर्तृत्व दोनों | हैं । उसमें पंचकृत्य होता रहता है । २-क्रिया अविद्या या माया का कार्य है । माया या अविद्या से | महेश्वर में स्वातन्त्र्य है । इस- उपहित होने पर ही ईश्वर क्रियावान् होता है । | लिए उसमें कर्तृत्व है । माया महेश्वर | से कोई पृथक् वस्तु नहीं है जिससे | वह उपहित हो जाता है । माया | महेश्वर की ही शक्ति है जिसके द्वारा | नानात्व और भेद घटित होते हैं । ३-माया अनिर्वचनीय है । | माया महेश्वर की शक्ति होने के | कारण सत्य है । ४-माया अनिर्वचनीय होने के कारण ईश्वर से असंहत या शिथिल | माया शिवमयी या चिन्मयी है । रूप से सम्बद्ध है और अन्ततोगत्वा असत्य है । माया कुछ पृथक् तत्व | वह शिव की निजी शक्ति है । वह जैसी लगती है । अतः शंकर का अद्वैतवाद व्याववृत्तिमूलक है । | पृथक् तत्व नहीं है । इसलिए शैव | अद्वैतवाद सर्वसंग्राही और पूर्ण है । | जीव दशा में भी शिव का पंचकृत्य | कभी बन्द नहीं होता । ६-जगत् मिथ्या है । विश्व केवल नामरूप है, अतः वह वस्तुतः | विश्व शिवरूप है, अतः सत्य है । सत्य नहीं है । | यह महेश्वर का वैभव है । आभास | शिव की परिकल्पना हैं, इस लिए वे | असत्य नहीं हो सकते । ५-जीव दशा में भी आत्मा निष्क्रिय है । क्रिया केवल बुद्धि में है । | जीव दशा में भी शिव का पंच- | कृत्य कभी बन्द नहीं होगा ।